शुक्रवार, सितंबर 25, 2015

इंजीनियर की समस्या और जाट बुद्धि


तीन-चार इंजीनियर एक टेढ़े मेढ़े पाइप में से तार डालने कि कोशिश कर रहे थे, 
लेकिन कामयाब नहीं हो पा रहे थे ! एक जाट कई दिन से ये सब देख रहा था 
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पांचवें दिन जाट बोला :-  मै करू साब ?? 
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इंजीनियर ने घूरा और बोला :-  हम पांच दिन से कोशिश कर रहे हैं, हमसे तो हुआ नहीं, 
तू कैसे निकालेगा ? ..... चल तू भी कोशिश कर ले...... 
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जाट बोला :-  ठीक है साब 
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जाट खेत मे गया ,,, एक चूहा पकड़ लाया और उसकी पूँछ मे तार बान्धा ,,, फिर चूहे को 
पाईप मे डाला ...... कुछ देर बाद चूहा दुसरी तरफ से तार के साथ बाहर निकल गया ! 


इंजीनियर अब तक कोमा में है
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:-) :-) :-) 
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बुधवार, सितंबर 09, 2015

मानवता को समर्पित एक शख्स


करीब तीस साल का एक युवक मुंबई के प्रसिद्ध टाटा कैंसर अस्पताल के सामने फुटपाथ पर खड़ा था। युवक वहां अस्पताल की सीढिय़ों पर मौत की दहलीज पर खड़े मरीजों को बड़े ध्यान दे देख रहा था, जिनके चेहरों पर दर्द और विवषता का भाव स्पष्ट नजर आ रहा था। इन रोगियों के साथ उनके रिश्तेदार भी परेशान थे। 
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वहां मौजूद रोगियों में से अधिकांश दूर दराज के गांवों के थे, जिन्हे यह भी नहीं पता था कि क्या करें, किससे मिले? इन लोगों के पास दवा और भोजन के भी पैसे नहीं थे। टाटा कैंसर अस्पताल के सामने का यह दृश्य देख कर वह तीस साल का युवक भारी मन से घर लौट आया। उसने यह ठान लिया कि इनके लिए कुछ करूंगा। कुछ करने की चाह ने उसे रात-दिन सोने नहीं दिया। अंतत: उसे एक रास्ता सूझा.. 
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उस युवक ने अपने होटल को किराये पर देक्रर कुछ पैसा उठाया। उसने इन पैसों से ठीक टाटा कैंसर अस्पताल के सामने एक भवन लेकर धर्मार्थ कार्य (चेरिटी वर्क) शुरू कर दिया। 
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उसकी यह गतिविधि अब 27 साल पूरे कर चुकी है और नित रोज प्रगति कर रही है। उक्त चेरिटेबिल संस्था कैंसर रोगियों और उनके रिश्तेदारों को निशुल्क भोजन उपलब्ध कराती है। करीब पचास लोगों से शुरू किए गए इस कार्य में संख्या लगातार बढ़ती गई। मरीजों की संख्या बढऩे पर मदद के लिए हाथ भी बढऩे लगे। सर्दी, गर्मी, बरसात हर मौसम को झेलने के बावजूद यह काम नहीं रूका। 
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यह पुनीत काम करने वाले युवक का नाम था हरकचंद सावला।
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एक काम में सफलता मिलने के बाद हरकचंद सावला जरूरतमंदों को निशुल्क दवा की आपूर्ति शुरू कर दी। इसके लिए उन्होंने मेडिसिन बैंक बनाया है, जिसमें तीन डॉक्टर और तीन फार्मासिस्ट स्वैच्छिक सेवा देते हैं। 
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57 साल की उम्र में भी सावला के उत्साह और ऊर्जा 27 साल पहले जैसी ही है। मानवता के लिए उनके योगदान को नमन करने की जरूरत है। यह विडंबना ही है कि 10 से 12 लाख कैंसर रोगियों को मुफ्त भोजन कराने वाले को कोई जानता तक नहीं। यहां मीडिया की भी भूमिका पर सवाल है, जो सावला जैसे लोगों को नजर अंदाज करती है। 
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यह हमे समझना होगा कि शिरडी में साई मंदिर, तिरुपति बाला जी आदि स्थानों पर लाखों रुपये दान करने से भगवान नहीं मिलेगा। भगवान हमारे आसपास ही रहता है। लेकिन हम बापू, महाराज या बाबा के रूप में विभिन्न स्टाइल देव पुरुष के पीछे पागलों की तरह चल रहे हैं। 
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End
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मंगलवार, सितंबर 08, 2015

जाओ बाबू, दरोगा बन जाओ ... (लघु कथा)

किसी ने उसे बता दिया था, कि "कलेट्टर साब के हियाँ चलजा, सब काम हो जाई"। 
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इसीलिए साहब के दरवाज़े पे बैठी थी। सुबह आठ बजे से बैठे-बैठे दुपहर के दो बज गए थे। सुतली के सहारे टिके चश्मे के भीतर धँसी, तरसती आँखों से उसने जाने कितने ही लोगों को भीतर जाते और बाहर आते देखा था। कम से कम बीसियों बार उसने खुद चपरासी से चिरौरी की थी, कि उसे अन्दर जाने दे। पर सब व्यर्थ गया। उसे यकीन हो चला कि कहीं कोई सुनवाई नहीं। 
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फिर भी आख़िरी बार उसने चपरासी से पूछा - "ए भईया, तनी देख न। साहब खाली भए ?" 
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"नहीं माता जी। साहब अभी खाना खाने गए हैं। अभी समय लगेगा। बैठो। नहीं तो जाओ, कुछ खा-पी के आना।" चपरासी ने उसे टालते हुए कहा। 
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साहब तो बस उठे ही थे जाने के लिए, आवाज़ सुन के बाहर आ गए - "क्या हुआ ? क्या बात है ?" 
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"सर ये बुढ़िया परेशान कर रही थी। अभी-अभी आई है, और, मिलना है-मिलना है चिल्ला रही है।" 
चपरासी ने खुद को बचाते हुए कहा। 
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"कहाँ से आई हो माता जी? अन्दर आ जाओ।" कलेक्टर साहब ने चपरासी को नज़रअंदाज़ करते हुए कहा, और खुद अन्दर चले। 

पीछे-पीछे बुढ़िया और उसके पीछे चपरासी कि कहीं कोई शिकायत ना कर दे बुढ़िया।" 

हम ओह पार से आ रहे हैं भईया।" बुढ़िया ने कहा।" 

यहाँ कब से बैठी हो?" साहब ने पूछा। 

"सर ये तो..." चपरासी ने कुछ सफाई देनी चाही।" 

तुम बाहर जाओ।" साहब की कड़कदार आवाज़ बिजली बन के गिरी, और चपरासी सरपट कमरे से बाहर निकल गया।" 

हाँ माता जी ...बताओ।" साहब ने बड़े ही आदर से पूछा। 
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बस फिर क्या था, अगले कुछ मिनटों में बुढ़िया के शब्दों ने उसकी भावनाओं पे जमी धूल की परतों को खुरच-खुरच के उतार दिया, और बरसों से सीने में दबा दर्द पिघल कर आँखों से बह चला। 
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साहब ने दो-एक फ़ोन किये और एक-आध लोगों को डाँट पिलाई। फ़िर बुढ़िया की तरफ़ मुड़ के बोले - 
"जाओ माता जी। तुम्हारा काम हो गया।" और उठने का उपक्रम किया। 
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बुढ़िया ने साड़ी के कोने की पोटली खोली और दस रुपये के कुछ फटे-पुराने नोट और सिक्के निकाल के कलेक्टर साब को देने लगी।" 

अरे ... ! ये मत किया करो माता जी। जाओ अब। कोई तुम्हे परेशान नहीं करेगा।" 
कहकर कलेक्टर साहब ने अपनी झेंप मिटाने की कोशिश की। 

बुढ़िया को सहसा विश्वास ही नहीं हुआ, उसने कहा - 
"खूब तरक्की करो भईया, बड़े हो जाओ बाबू, दरोगा बन जाओ।" 

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The End
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सऊदी अरब का स्टूडेंट


आस्टेलिया में रहकर पढने वाले सऊदी अरब के स्टूडेंट ने अपने अब्बा जान को मेल किया :- 

"आस्टेलिया बहुत ही सुंदर देश है ... 
और उतने ही सुंदर यहां के लोग ... 
लेकिन मुझे उस समय शर्म आती है, जब मै 20 तोले की सोने की चेन गले में डालकर 
अपनी फरारी से कालेज जाता हूँ... जबकि सभी लोग ट्रेन से कालेज जाते हैं...." 

-- आपका बेटा नसीर 
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..
दूसरे दिन उसे 
अब्बा का मेल मिला :- 

"बेटे अब तुम्हें भी झिझकने या शर्म महसूस करने की जरुरत नही ... 
क्योंकि मैंने तुम्हारे खाते में 20 मिलियन डॉलर डाल दिये हैं.... जाओ तुम भी ट्रेन ले लो....." 

-- तुम्हारा बाप अल हबीबी 
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:-) :-) :-) 
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गाँव का क़ानून ... !! :-)

एक बार संता ने एक कबूतर का शिकार किया, वह कबूतर जाकर एक खेत में गिरा ! 
जब संता उस खेत में कबूतर को उठाने पहुंचा तभी एक किसान वहां आया और संता को पूछने लगा कि 
वह उसकी प्रोपर्टी में क्या कर रहा है ? 

संता ने कबूतर को दिखाते हुए कहा – 
“मैंने इस कबूतर को मारा और ये मर कर यहाँ गिर गया मैं इसे लेने आया हूँ!” 

किसान – “ये कबूतर मेरा है क्योंकि ये मेरे खेत में पड़ा है!” 

संता – “क्या तुम जानते हो तुम किससे बात कर रहे हो?” 

किसान – “नहीं मैं नहीं जानता और मुझे इससे भी कुछ नहीं लेना है कि तुम कौन हो!” 

संता – “मैं हाईकोर्ट का वकील हूँ, अगर तुमने मुझे इस कबूतर को ले जाने से रोका तो मैं तुम पर ऐसा मुकदमा चलाऊंगा कि तुम्हें तुम्हारी जमीन जायदाद से बेदखल कर दूंगा और रास्ते का भिखारी बना दूंगा!” 

किसान ने कहा – “हम किसी से नहीं डरते …..........समझे ?
हमारे गाँव में तो बस एक ही कानून चलता है… लात मारने वाला!” 

संता – “ये कौन सा क़ानून है … मैंने तो कभी इसके बारे में नहीं सुना !” 

किसान ने कहा -“मैं तुम्हें तीन लातें मारता हूँ अगर तुम वापिस उठकर तीन लातें मुझे मार पाओगे तो 
तुम इस कबूतर को ले जा सकते हो !” 

संता ने सोचा ये ठीक है ये मरियल सा आदमी है, इसकी लातों से मुझे क्या फर्क पड़ेगा ! 
ये सोचकर उसने कहा – “ठीक है मारो!” 

किसान ने बड़ी बेरहमी से संता को पहली लात टांगों के बीच में मारी, जिससे संता मुहं के बल झुक गया! 
किसान ने दूसरी लात संता के मुहं पर मारी, जिसके पड़ते ही वह जमीन पर गिर गया! तीसरी लात किसान ने संता की पसलियों पर मारी. 

बहुत देर बाद संता उठा और जब लात मारने के लायक हुआ तो किसान से बोला – “अब मेरी बारी है!” 

किसान – “चलो छोड़ो यार ... झगडे में क्या रखा है ...  ये कबूतर तुम ही रखो !” 

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:-) :-) :-)
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सोमवार, सितंबर 07, 2015

गोल गप्पे वाला और बेचारा मैं :-)


रविवार का दिन था, आज गोल गप्पे खाने की इच्छा हुयी। शाम को गोलगप्पे का ठेला जो कि हमारी कॉलोनी के बाहर रोड पर ही खड़ा रहता है, वहीँ चले गए और देखा तो वहाँ काफी भीड़ थी...लोग हाथ में प्लेट लेकर लाइन में लगे हुए थे। तकरीबन 15 मिनिट के बाद हमारा भी नम्बर आ गया.... लेकिन उस 15 मिनट के दौरान में यह सोचता रहा कि - 
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बेचारा क्या कमाता होगा ... ?? 
बेचारा बड़ी मेहनत करता है ... ?? 
बेचारा घर का गुजारा कैसे चलाता होगा ... ??
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जब हमारी बारी आई तो मैंने गोल गप्पे वाले से यूँही पूछ लिया - 
"भाई क्या कमा लेते हो दिन भर में" (मुझे उम्मीद थी की 300-400 रुपये बन जाता होगा गरीब आदमी का) -- 
गोल गप्पे वाला - "साहब जी भगवान की कृपा से माल पूरा लग जाता है" 
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मैंने पुछा - "मैं समझा नही भाई, मतलब जरा अच्छे से समझाओ" 
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गोल गप्पे वाला - "साहब हम सुबह में 7 बजे घर से 3000 गोलगप्पे लेकर के निकलते है और शाम को 7 बजने से पहले भगवान की कृपा से सब माल लग जाता है" 
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मैंने हिसाब लगाया कि यह 10 रुपये में 6 गोल गप्पे खिलाता है मतलब की 3000 गोल गप्पे बिकने पर उसको 5000 रुपये मिलते होंगे और अगर 50% उसका प्रॉफिट मान लें तो वह दिन के 2500 रुपये या उससे भी ज्यादा कमा लेता है...!!! यानी कि महीने के 75,000 रुपये !!! 
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यह सोचकर तो मेरा दिमाग चकराने लगा.... 
अब मुझे गोलगप्पे वाला बेचारा नजर नही आ रहा था...बेचारा तो मैं हो गया था...!! 

एक 7-8 क्लास पढ़ा इन्सान इज्जत के साथ महीने के 75,000 रुपये कमा रहा है... 
उसने अपना 45 लाख का घर ले लिया है...और 4 दुकाने खरीद कर किराये पर दे रखी है 
जिनका महीने का किराया 30,000 रुपये आता है...। 
और हमने वर्षों तक पढ़ाई की, उसके बाद 20-25 हजार की नौकरी कर रहे है.... 
किराये के मकान में रह रहे है... यूँ ही टाई बांधकर झुठी शान में घूम रहे हैं...  
दिल तो किया की उसी गोलगप्पे में कूदकर डूब जाऊं... 
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किसी ने सही कहा है ... 
"Dont Under Estimate Power of The Common Man
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:-) :-) :-)
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कला पारखी और जुम्मन मियां


बाजार की एक गली में जुम्मन मियां की छोटी सी मगर बहुत पुरानी कपड़े सिलाई की दुकान थी। उनकी इकलौती सिलाई मशीन के बगल में एक बिल्ली बैठी एक पुराने गंदे कटोरे में दूध पी रही थी। 

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एक बहुत बड़ा कला पारखी जुम्मन मियां की दुकान के सामने से गुजरा। बिल्ली के कटोरे को देख वह आश्चर्यचकित रह गया। वह कला-पारखी होने के कारण जान गया कि कटोरा एक एंटीक आइटम है और कला के बाजार में बढ़िया कीमत में बिकेगा, लेकिन वह ये नहीं चाहता था कि जुम्मन मियां को इस बात का पता लगे कि उनके पास मौजूद वह गंदा सा पुराना कटोरा इतना कीमती है। 
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कला-पारखी ने दिमाग लगाया और जुम्मन मियां से बोला - 
'बड़े मियां आदाब ! आप की बिल्ली बहुत प्यारी है, मुझे पसंद आ गई है। क्या आप बिल्ली मुझे देंगे? 
चाहे तो कीमत ले लीजिए।' 
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जुम्मन मियां ने पहले तो इनकार किया मगर जब कला-पारखी कीमत बढ़ाते-बढ़ाते दस हजार रुपयों तक पहुंच गया तो जुम्मन मियां बिल्ली बेचने को राजी हो गए।
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कला-पारखी जुम्मन मियां को दाम चुकाकर  बिल्ली लेकर जाने लगा। अचानक वह रुका और पलटकर जुम्मन मिया से बोला - 
"बड़े मियां बिल्ली तो आपने बेच दी। अब इस पुराने कटोरे का आप क्या करोगे? इसे भी मुझे ही दे दीजिए। बिल्ली को दूध पिलाने के काम आएगा। चाहे तो इसके भी 100-50 रुपए ले लीजिए।' 
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जुम्मन मियां ने जवाब दिया - 
"नहीं साहब, कटोरा तो मैं किसी कीमत पर नहीं बेचूंगा, क्योंकि इसी कटोरे की वजह से आज तक मैं 50 बिल्लियां बेच चुका हूं। 
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काग दही पर जान गँवायो :-)


एक बार एक कवि हलवाई की दुकान पहुँचे, जलेबी और दही ली और वहीं खाने बैठ गये। 
इतने में एक कौआ कहीं से आया और दही की परात में चोंच मारकर उड़ चला। 
हलवाई को बड़ा गुस्सा आया उसने पत्थर उठाया और कौए को दे मारा। 
कौए की किस्मत ख़राब, पत्थर सीधे उसे लगा और वो मर गया। 
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कवि महोदय के हृदय में ये घटना देख  दर्द जगा। 
वो जलेबी, दही खाने के बाद पानी पीने पहुँचे तो उन्होने एक कोयले के टुकड़े से वहाँ एक पंक्ति लिख दी :- 
"काग दही पर जान गँवायो" 
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तभी वहाँ एक लेखपाल महोदय जो कागजों में हेराफेरी की वजह से निलम्बित हो गये थे, पानी पीने पहुँचे। 
कवि की लिखी पंक्तियों पर जब उनकी नजर पड़ी तो अनायास ही उनके मुँह से निकल पड़ा, कितनी सही बात लिखी है! क्योंकि उन्होने उसे कुछ इस तरह पढ़ा - 
"कागद ही पर जान गँवायो" 
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तभी एक मजनू टाइप लड़का पिटा-पिटाया सा वहाँ पानी पीने पहुँचा। उसने पढ़ा तो उसे भी लगा कि 
कितनी सच्ची बात लिखी है, काश उसे ये पहले पता होती, 
क्योंकि उसने उसे कुछ यूँ पढ़ा था- 
"का गदही पर जान गँवायो" 
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शायद इसीलिए तुलसीदास जी ने बहुत पहले ही लिख दिया था, 
"जाकी रही भावना जैसी ........................ 
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शनिवार, सितंबर 05, 2015

हिंदी के अध्यापक और साइकल मिस्त्री


परसों की बात है 

हिंदी के अध्यापक मिश्रा जी साइकिल मिस्त्री की दुकान पे हवा डलाने पहुँचे 

मिश्रा जी :- लो भाई !!! अगले पहिये में हवा डाल दो. थोड़ी कम है 

दुकानदार :- मास्साब ! आप तो हिंदी के टीचर हो जरा शुद्ध हिंदी में बताओ तो हम भी जाने कि आप हमारे बच्चों को कितना अच्छे से हिंदी पढ़ाते हो. 

मिश्राजी :- प्रथम तो ये, क़ि मुझे शिक्षक उदबोधित् कीजिये टीचर नहीं ... अब सुनो :

"हे कनस्तरनुमा ! लौह~गुमठि में विराजमान द्विचक्र~वाहिनी सुधारक, मेरी द्विचक्र~वाहिनी के अग्रिम चक्र से अल्प वायु निगमन कर गयी है ,,, कृपया अपने वायु-रेचक यंत्र से अग्रिम चक्र में थोड़ी वायु प्रविष्ट करने की कृपा करें, ताकि मैं नियत समय पर पहुँच कर, आप जैसे मूढ़मति पिता के ज्ञानरिक्त मस्तिष्क लिये बैठे पुत्रों के मस्तिष्क में ज्ञान की प्रविष्टि करने की अपनी दैनिक क्रिया को पूर्ण कर सकूँ ... . समझे ??? 


तब से आज तक साइकिल वाले दुकानदार का सिर घूम रहा है ! .
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प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद


एक बेटा अपने वृद्ध पिता को रात्रि भोज के लिए एक अच्छे रेस्टॉरेंट में लेकर गया। 

खाने के दौरान वृद्ध और कमजोर पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया। रेस्टॉरेंट में बैठे दुसरे खाना खा रहे लोग वृद्ध को घृणा की नजरों से देख रहे थे लेकिन वृद्ध का बेटा शांत था। 

खाने के बाद बिना किसी शर्म के बेटा, वृद्ध को वॉश रूम ले गया। उसके कपड़े साफ़ किये, उसका चेहरा साफ़ किया, उसके बालों में कंघी की, उसे चश्मा पहनाया और फिर बाहर लाया। सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे। 

बेटे ने बिल पे किया और वृद्ध के साथ बाहर जाने लगा। तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने बेटे को आवाज दी और उससे पूछा ---
"क्या तुम्हे नहीं लगता कि यहाँ अपने पीछे तुम कुछ छोड़ कर जा रहे हो ??" 


बेटे ने जवाब दिया--- "नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़ कर नहीं जा रहा।" 

वृद्ध ने कहा--- 
"बेटे, तुम यहाँ छोड़ कर जा रहे हो, 
प्रत्येक पुत्र के लिए एक सबक और प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद" 
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चोर और ख्वाब की ताबीर


रात में एक चोर घर में घुसता है। 
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कमरे का दरवाजा खोला तो मुसहरी पर एक बूढ़ी खूसट औरत सो रही थी। 
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चोर की खटपट से उसकी आंख खुल गई। चोर ने घबरा कर देखा तो वह लेटे लेटे बोली - 

''बेटा, तुम देखने से किसी अच्छे घर के लगते हो, लगता है किसी परेशानी से मजबूर होकर इस रास्ते पर लग गए हो। चलो कोई बात नहीं।अलमारी के तीसरे बक्से में एक तिजोरी है। इसमें का सारा माल तुम चुपचाप ले जाना।" 
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"अच्छा .... जरा सुनो बेटा ... पहले मेरे पास आकर बैठो, मैंने अभी-अभी एक ख्वाब देखा है । वह सुनकर जरा मुझे इसकी ताबीर तो बता दो।" 
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चोर उस बूढ़ी औरत की रहमदिली से बड़ा मुतास्सिर हुआ और चुपचाप उसके पास जाकर बैठ गया। बुढ़िया ने अपना सपना सुनाना शुरु किया - 

''बेटा मैंने देखा कि मैं एक रेगिस्तान में खो गइ हूँ। ऐसे में एक चील मेरे पास आई और उसने 3 बार जोर-जोर से बोला - माजिद। । माजिद। । माजिद !!! बस फिर ख्वाब खत्म हो गया और मेरी आंख खुल गई। जरा बताओ तो इसकी क्या ताबीर हुई?'' 
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चोर सोच में पड़ गया। इतने में बराबर वाले कमरे से बुढ़िया का नोजवान बेटा माजिद अपना नाम ज़ोर-ज़ोर से सुनकर उठ गया और अंदर आकर चोर की जमकर ठुकाई लगाई। 
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बुढ़िया बोली - ''बस करो अब यह अपने किए की सजा भुगत चुका।" 
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''चोर बोला - नहीं नहीं .. मेरी और ठुकाई करो हरामखोरों ताकि मुझे आगे याद रहे कि मैं चोर हूँ सपनों की ताबीर बताने वाला नहीं।'' 
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