Aaj Ki Aawaaz

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घर सा घर ... अब कहाँ है घर

Posted by प्रकाश गोविन्द on Tuesday, October 6

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'घर' एक वास्तु मात्र न होकर भावसूचक संज्ञा भी है ! घर से अधिक सजीव एवं घर से अधिक निर्जीव भला क्या हो सकता है ! अनगिनत भावनाओं और प्रतीकों का मिला-जुला रूप है घर !


"कमरा नंबर एक / जहाँ दो-दो सड़कों के दुःशासनी हाथ / उसकी दीवारें उतार लेने को / लपके ही रहते हैं / / कमरा नंबर दो / जहाँ खिड़की से आसमान दिखता है / धुप भी आती है / कमरा नंबर तीन जो आँगन में खुलता है / जिसका दरवाजा पूरे घर को / रौशनी की बाढ़ में तैरा सकता है !! मगर अफसोस कि / रौशनी के साथ-साथ / पडोसी घरों का धुआं भी / भीतर भर आता है "

उपरोक्त पंक्तियों में घर का बिम्ब उभरता है ! यह बिम्ब भारतीय घर का ही है ! यह घर प्राचीन भी है, मध्कालीन भी और समकालीन भी ! यह बिम्ब बहुत सुखद नहीं है ! साहित्य में 'घर' वह भी होता है जो घर की स्मृति से, घरेलु रिश्तों द्वारा निर्मित और परिभाषित होता है : 30666375_1

"घर/ हैं कहाँ जिनकी हम बात करते हैं/ घर की बातें/ सबकी अपनी हैं/ घर की बातें/ कोई किसी से नहीं करता/ जिनकी बातें होती हैं/ वे घर नहीं होते"
[ - अज्ञेय ]
जैसा कि पहले ही कहा कि घर से अधिक सजीव और घर से अधिक निर्जीव क्या हो सकता है ? ईंट-गारे के बने चाहर- दीवारों को घर नहीं माना जा सकता ! घर के साथ जुड़े रहते हैं अनेकों रिश्ते - माँ, पिताजी, भाई, बहन, भाभी, चाचा, चाची ...... ! घर के साथ जुड़े रहते हैं अनेकों शब्द ..... प्रतीक्षा, प्रेम, सुरक्षा, नींद, भूख, भोजन, सुख-दुःख .............. :

lightbox_08SelfPortVermeer "कहाँ भाग गया घर / साथ-साथ चलते हुए / इस शहर के फुटपाथों पर / हमने सपना देखा था / एक छोटे से घर का, / और जब सपना / घर बन गया, // हम अलग-अलग कमरों में बंट गए" !

जैसे घरों में हम सचमुच (अथवा स्मृति में) रहते हैं, वैसा ही घर साहित्य में भी रचते हैं ! साहित्य में हमारी स्म्रतियां, अनुभूतियाँ अपना घर ही तो खोजती हैं - बनाती हैं ! यदि हम अब एक साथ रहने वाले केवल एक उपभोक्ता समुदाय बन गए हैं - सीमेंट-कंक्रीट के जंगलों में अपने चेहरे की तलाश में भटकते आकार मात्र - तो साहित्य इसे प्रतिबिंबित करेगा ही :

"ये दीवारें / मेरा घर हैं / वह घर / जिसके सपने देखती मैं / विक्षिप्तता की सुरंग में भटक गयी थी / इसकी छत के नीचे खड़ी / सोचती हूँ / यह तो मेरा सपना नहीं है / न ही भाव बोध / न ही कलात्मक रुचियों की अभिव्यक्ति" - (कुसुम अंसल)

IMG_0015यदि सचमुच हमारा अपना विश्वास खंडित हो चुका है, पारंपरिक जीवन मूल्य भूल चुके हैं, स्वयं अपने 'आत्म' से निर्वासित हो चुके हैं तो यह आत्मनिर्वासन हमारे साहित्य को प्रभावित किये बिना कैसे रहेगा ? मुझे 'इंदिरा राठौर जी" की कविता याद आ रही है :

वही घर, वही लोग / लेकिन घर अब बासी लगता है / वैचारिक प्रगतिशीलता के आवरण में / सब दकियानूसी लगता है / बच्चे जनता है, भटकता है रोजगार के लिए / रोते शिकायत करते / आखिर ख़त्म हो जाता है घर /// हर कोने-अंतरे टंगे रहते हैं प्रश्न / मकडी के जालों से / घर चाहता है 'बड़े लोगों में' आयें नजर हम / समाज को दिखाएँ रूआब अपना / पैसा, ताकत, प्रतिष्ठा .... / घर अगर संकुचित है यहीं तक / तो यह मेरा घर नहीं है ..... यह मेरा घर नहीं है "

जिस आधुनिक सभ्यता के घिराव में हम आ गए हैं, उसमें भारतीय आदर्शवादी घर की गुंजाईश ही कहाँ बची है ! इस आधुनिक सभ्यता का जो कठोरतम वज्रपात हुआ है, वह तो इस घर की गृहिणी पर ही हुआ है ! निर्मल वर्मा जी की एक कहानी में यह मानसिक द्वंद स्पष्ट दिखाई देता है :

'घर कहीं नहीं था ! दुःख था ... बाँझ दुःख, जिसका कोई फल नहीं था, जो एक-दुसरे से टकराकर ख़त्म हो जाता है
और हम उसे नहीं देख पाते जब तक आधा रिश्ता पानी में नहीं डूब जाता !'

Painting_3_v02_LR.246154359 आधुनिक साहित्य में 'भारतीय घर' तेजी से हिचकोले खा रहा है ! कारण साफ है : समाज को स्त्री ने जन्म दिया ! दलबद्ध भाव से रहने के प्रति निष्ठां होने के कारण वह उसी समाज की अनुचरी हो गयी ! पुरुष समाज से भागना चाहता था ! स्त्री ने अपना हक़ त्यागकर उसे समाज में रखा - उसके हाथ में समाज की नकेल दे दी ! .... आज वह देखती है कि उसी के बुने हुए जाल ने उसे बुरी तरह जकड डाला है, जिससे निकलने के लिए उसकी छटपटाहट निरंतर जारी है !

गुजरे कई वर्षों के दौरान हमारे यहाँ जीवन का काफी तिरस्कार सा रहा, जिसका परिणाम हमें भौतिक दासता के रूप में ही नहीं बल्कि स्वयं अपने विचार, दर्शन और संवेदन की भी पंगुता के रूप में भुगतना पड़ रहा है ! घर की याद भी तभी है जब घर नहीं होता अथवा घर, घर जैसा नहीं होता ! श्रीकांत जी की कविता की पंक्ति याद आ रही हैं :
मैं महुए के वन में एक कंडे सा /सुलगना, धुन्धुवाना चाहता हूँ /मैं घर जाना चाहता हूँ..

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की 'यहीं कहीं एक कच्ची सड़क थी' शीर्षक कविता भी याद आ रही है, जिसमें एक खोये हुए घर का विषाद है और उसे तलाश करने की छटपटाहट भी ! रवींद्र नाथ ठाकुर जी की लिखी एक कहानी है - 'होमकमिंग' ! कहानी का मुख्य पात्र 'जतिन चक्रवर्ती' दिन भर घर से बाहर भटकता और शैतानियाँ करता रहता है ! उसे सुधारने के लिए उसके माँ-बाप उसे कलकत्ता भेज देते हैं, जहाँ उसका बिलकुल मन नहीं लगता ! वह अपने घर के लिए तड़पता हुआ एक-एक दिन गिनता रहता है कि कब छुटियाँ मिलें और कब वह घर पहुंचे ! आखिर एक दिन उसे छुट्टी मिल जाती है किन्तु म्रत्यु शय्या पर ! बेहोशी की सी बीमारावस्था में घर-घर बड- बडाता हुआ वह चल बसता है !
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ऐसा लगता है कि जतिन चक्रवर्ती की इस विडम्बनापूर्ण नियति को हमारे अधिकाँश लेखकों ने स्वीकार कर लिया है ! किन्तु वे घर का दुखडा भी नहीं रोते, न ही उसकी नुमाईश करते हैं ! वे स्थिति का सामना करते हैं और पुनर्वास का भी ! अज्ञेय जी का काव्य संग्रह 'ऐसा कोई घर आपने देखा है' में ऐसा ही कुछ है :

"घर मेरा कोई है नहीं / घर मुझे चाहिए / घर के भीतर प्रकाश हो / इसकी भी मुझे चिंता नहीं / प्रकाश के घेरे के भीतर मेरा घर हो / इसी की मुझे तलाश है / ऐसा कोई घर आपने देखा है ? / न देखा हो / तो भी हम / बेघरों की परस्पर हमदर्दी के / घेरे में तो रह ही सकते हैं "

'बेघरों की परस्पर हमदर्दी का घेरा' अपने आप में प्रकाश का घेरा चाहे न भी हो, किन्तु वह वह उसकी अनिवार्य भूमिका निश्चय ही है ! कम से कम वह उस अँधेरे के घेरे को तोड़ने का पहला उपक्रम तो है ही ! उस अँधेरे के घेरे को तोड़ने का - जो प्राकृतिक नहीं, मानव निर्मित सांस्कृतिक अँधेरा :

"मैंने अपने घर का नंबर मिटाया है / और गली के सिरे पर लगा गली का नाम हटाया है / और हर सड़क की दिशा का नाम पोंछ दिया है / पर अगर तुम्हे मुझसे जरूर मिलना है / तो हर देश के शहर की हर गली का हर दरवाजा खटखटाओ ..... / यह एक शाप है, एक वरदान है / जहाँ भी स्वतंत्र रूह की झलक मिले / समझ जाना वह मेरा घर है !"

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अकेला / हमदर्द [दो लघु-कथाएँ]

Posted by प्रकाश गोविन्द on Monday, July 27


पिछली पोस्ट में मैने अपने पहली लघु-कथा (यकीन) प्रस्तुत की थी !
इस बार मित्रों के आग्रह पर दो लघु कथाएँ पेश कर रहा हूँ ! जिसमें 'अकेला' मेरी लिखी आख़िरी लघु-कथा है ! इसको मैने 16 मार्च 2006 को लिखा था !
यह बात उस समय की है जब सुप्रसिद्ध लेखिका सुश्री मेहरुन्निसा परवेज़ के संपादन में 'समर लोक' का विशेषांक धूमधाम से आने वाला था ! उन्होने मेरी एक पूर्व प्रकाशित कहानी - 'भूल जा' की प्रशंसा करते हुए, मुझसे मेरी अप्रकाशित लघु-कथा की माँग की थी !
समय बहुत ही कम था ! बस मैने एक पहले की लिखी लघु-कथा 'हमदर्द' के साथ इस लघु-कथा को भी भेज दिया था ! जानता था कि स्तरहीन रचना है .......
लेकिन अप्रत्याशित रूप से मुझे हैरत में डालते हुए विशेषांक में यह दोनों लघु-कथाएँ प्रकाशित हुयीं ! बाद में यह रचना संकल्प, शब्द सृजन, आजकल, अविरल मंथन, राष्ट्रीय सहारा आदि पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुयी !
गुजारिश है कि अगर आप कहानी के शिल्प पर ध्यान न देकर सिर्फ कथ्य पर ध्यान फोकस करेंगे ... तो शायद कुछ पठनीय लगे आपको !
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अकेला [लघु-कथा]
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यूँ तो पूरे गाँव में सौ के लगभग घर थे, फिर भी उसे अपने अलग-थलग पड़ जाने की कसक थी ! यह बात मन को बहुत कचोटती थी कि पूरे गाँव में उसकी जाती-बिरादरी का कोई भी व्यक्ति ना था !
मैट्रिक की पढ़ाई के पश्‍चात कुछ ऐसा संयोग बना कि आगे के अध्ययन के लिए अपने मामा के पास दूसरे प्रदेश जाना पड़ा ! अब उसका एकाकीपन और भी बढ़ गया था ! जब भी उसे कोई अपनी तरफ का व्यक्ति मिलता, उसका मन प्रफुल्लित हो उठता ... चेहरे की चमक बढ़ जाती ! उसके बाद फिर वही अकेलापन !
पढ़ने-लिखने में आरंभ से ही मेधावी छात्र होने के कारण इंजीनियरिंग कालेज में चयन हो गया ! इंजीनियरिंग में टॉप करने के उपरांत विदेश जाने का अवसर मिला तो अमेरिका के लिए रवाना हो गया ! वहीं 'स्पेस रिसर्च सेंटर' में नौकरी भी लग गयी ! सभी ऐशो-आराम वा सुख-सुविधाओं के बीच भी उसे सदैव तलाश रहती थी, अपने देश के किसी भी व्यक्ति की ! भीड़ से घिरा रहने के बावजूद भी वह अपनी तन्हाई से परेशान रहता !
बहुउद्देशीय परियोजना के अंतर्गत अंतरिक्ष में स्थापित प्रयोगशाला में शोध
कार्य हेतु प्रतिभाशाली तीन लोगों का चयन हुआ तो उसमें उसका भी नाम था !


आज उसे अंतरिक्ष में स्थित लैब में काम करते हुए आठ दिन हो गये थे ! दो दिन पूर्व उसके दोनो सहयोगी पृथ्वी पर अति-आवश्यक उपकरण सामग्री लाने गये थे ! अब उसे घबराहट हो रही थी ! उसका एकाकीपन वाला बुखार तेज होता जा रहा था !
उसके अधीर व व्याकुल मन को प्रतीक्षा थी -
'पृथ्वी के किसी भी व्यक्ति की !'
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हमदर्द [लघु-कथा]
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एक लंबी आह भरते हुए उन्होने अख़बार से सिर उठाया,
'ओह, क्रुएल, किस कदर निर्दयी हैं !'
फिर उनकी दृष्टि पास बैठे साथियों पर घूम गयी,
'देखिए साहब,
साइंस के नाम पर बेचारे जानवरों पर कितना ज़ुल्म हो रहा है !'
मेज पर अख़बार फैलाते हुए वे बोले,
'ज़रा देखिए,
इस बेचारे मंकी चाइल्ड को,
इसकी आँखों में कितना दर्द दिखाई दे रहा है,
बेचारा मासूम है .... तड़प रहा होगा दर्द से, मगर बेज़ुबान है !
अपनी पीड़ा व्यक्त नहीं कर सकता, कहे भी तो किसे ?'
'क्या हुआ .... ?' लोगों की निगाहें समाचार-पत्र में छ्पे चित्र पर टिक गयी !
'अरे इस बेचारे का दिल काटकर निकाल दिया और इस मासूम बच्चे को मशीन का दिल लगाकर दो महीने से जिंदा रखे हुए हैं ! कितना अमानवीय कार्य है और फिर इस परीक्षण को विज्ञान की सफलता कहते हैं !
इस बेचारे के दर्द का ज़रा भी एहसास नहीं ...... !'
'साहब, ........
ख़ानसामा ने कमरे में आते हुए पूछा, - 'आज मुर्गा बनेगा या मीट ?'
'अरे भाई, मुर्गा ही ले आओ, लेकिन हाँ .. पिछली बार का मुर्गा ज़रा सख़्त था !
लगता है बड़ा मुर्गा ले आए थे ! ऐसा करो, एक बड़े की जगह दो छोटे-छोटे चूजे ले आओ ! दस-बीस रुपया ज्यादा लग जाए तो कोई बात नहीं !'
और साहब फिर से गंभीरतापूर्वक अख़बार की
अन्य खबरें पढ़ने में व्यस्त हो गये !
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यकीन

Posted by प्रकाश गोविन्द on Thursday, June 25


मेरी पहली लघु कथा, जो मैंने 22 अगस्त 1989 को लिखी थी !
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यकीन [लघु कथा]



वह दोनों आमने-सामने बैठे थे ! बीच में एक छोटी सी गोल मेज थी !
जिसमें कॉफी के दो प्याले, एक शुगर पाँट, दो चम्मच और एक ऐश ट्रे
पड़ी थी !
आदमी सिगरेट पीते हुए थोड़ी-थोड़ी देर बाद मुस्करा देता था !
औरत चुप थी, लेकिन आदमी की मुस्कराहट से परेशान हो उठती थी !
उसने आदमी से पूछा - "कितने चम्मच चीनी" ?
आदमी ने सन्क्षिप्त जवाब दिया - "दो चम्मच" !
"लेकिन तुम तो हमेशा एक चम्मच चीनी लेते हो" ?
"हाँ" !
"फिर" ?
"आज से पहले तुमने भी तो कभी कुछ पूछा नहीं" !
"हाँ .... लेकिन" ?
"लेकिन कुछ नहीं , आज कॉफी कुछ अधिक मीठी हो तो अच्छा है" !
औरत ने चुपचाप दो चम्मच चीनी डाली और कप आदमी की तरफ
बढा दिया ! दोनों धीरे-धीरे कॉफी 'सिप' करने लगे और आहिस्ता-
आहिस्ता कप खाली हो गए !
सन्नाटे को तोड़ते हुए औरत बोली -
"जानते हो तुम्हारी कॉफी में जहर था, ....
जो एक घंटे बाद तुम पर अपना असर दिखायेगा" !
आदमी ने सुना और आहिस्ता से बोला - "मालूम था" !
औरत ने ठहाका लगाया और बोली -
"यानी कि तुमको मालूम था ... इस कप में जहर था
फिर भी तुम पी गए ! ....
जबकि तुम मना कर सकते थे या बहाने से कप गिरा सकते थे
या फिर अलमारी से अपना रिवाल्वर निकालकर मुझे गोली भी
मार सकते थे ,
लेकिन तुमने यह सब नहीं किया और कॉफी पी गए" !
"हाँ जानता था फिर भी मैं पी गया ! इसका भी एक कारण है ...
मैं यकीन नहीं कर पा रहा था कि तुम मुझे जहर भी दे सकती हो ...
और दुविधा में जीने से बेहतर है असलियत जानने की ललक में
मर जाना" !

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[कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित]

वो कागज़ कि कश्ती .......

Posted by प्रकाश गोविन्द on Thursday, May 7

काफी दिनों बाद ब्लॉग लिखने बैठा हूँ !


इतने दिनों बाद अगर लिखने जा रहा हूँ तो इसका कसूरवार मैं नहीं हूँ
बल्कि विनीता यशस्वी जी हैं !
जिन्होंने डांट-डपटकर मुझे पुनः ब्लॉग लिखने को प्रेरित किया !

क अत्यंत प्रिय ब्लॉगर साथी ने कुछ ही दिन पहले मेल में लिखा कि
" कितने बच्चे हैं न हम आज भी भीतर से ...!"

इन शब्दों ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर हम बड़ों की
दुनिया इतनी उदास और बुझी-बुझी सी शायद इसीलिये रहती है क्योंकि हम
अपने बचपने को कब तिलांजली दे देते हैं हमें मालूम ही नहीं चलता !
जिस दिन हम अपना बचपना खोते हैं ... खुशिया भी हमसे महरूम हो जाती हैं !
कृत्रिमता के आवरण से घिरते जाते हम खुल के हँसना और गुनगुनाना भूल
जाते हैं !
जीवन दर्शन को समझना बेहद जरूरी है !
कहीं जिंदगी काम के बोझ तले कुंठित न रह जाए !
आप ख़ुद अपने लिए समय न निकाल सकें !
जीवन की छोटी-छोटी खुशियों का आनंद न ले सकें तो
फिर जीवन का अर्थ क्या रह जाता है ?

इब्ने ईशा की एक बहुत ही खूबसूरत नज्म है :

एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों
एक मेले में पहुँचा हमकता हुआ
दिल मचलता था एक-एक शै पे मगर
जेब खाली थी कुछ मोल ले न सका
लौट आया लिए हसरतें सैकडों
एक छोटा सा लड़का था मैं जिन दिनों
खैर महरूमियों के वे दिन तो गए
आज मेला लगा है उसी शान से
आज चाहूँ तो इक-इक दूकान मोल लूँ
आज चाहूँ तो सारा जहाँ मोल लूँ
न-रसाई का अब जी में धड़का कहाँ
पर वो छोटा सा अल्हड सा लड़का कहाँ !!!

इस नज्म में न जाने कितने कितने
हम सबकी कहानी शामिल है !
आज सब कुछ मुहैया है तो किसी के दिल से
आवाज भी आती है -
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है ......

कोई आह भरकर कह उठता है -
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो कागज़ कि कश्ती वो बारिश का पानी

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