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शनिवार, जून 18, 2016

बेहतरीन थ्री डी चित्रकारी


वाह ... गज़ब का कलाकार 
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शुक्रवार, जून 17, 2016

ये तो रियल हीरो है ...


बेंगलुरु के विनीत विजियन ने एमबीबीएस स्टूडेंट की स्टोरी शेयर की है।

विनीत विजयन नाम के शख्स ने फेसबुक पर लिखा है : - 'मैं बेंगलुरु मेडिकल कॉलेज के लिए ऑटो का इंतजार कर रहा था। दरअसल, वहां मेरे दोस्त की मां भर्ती थीं, जिन्हें मैं देखने जा रहा था। तभी एक ऑटो रुका। 
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मैंने आॅटो ड्राइवर से कहा- पीठ में दर्द है, आराम से चलना। उसने जवाब दिया, ठीक है सर। अमूमन ऐसा जवाब बेंगलुरु में आॅटो चालकों से सुनने को नहीं मिलता है। कुछ देर में ही मेडिकल कॉलेज पहुंच गया। 
मैंने उससे पूछा कि कितना किराया हुआ। वह सीट के पास लगे बॉक्स की ओर इशारा कर बोला, जो इच्छा हो सर, इसमें डाल दीजिए। 
कुछ देर तक तो मैं सोचता रहा, फिर डिब्बे को गौर से देखा तो उसके ऊपर लिखा था, गरीबों और जरूरतमंदों के लिए डोनेशन कीजिए। इस बीच देखा कि जो सिक्युरिटी गार्ड मेन गेट पर किसी की गाड़ी तक खड़ी नहीं होने देता। वो ड्राइवर को देखकर मुस्कुरा रहा है। फिर उससे बोलता है... नमस्कार सर। मुझे लगा शायद सिक्युरिटी गार्ड ड्राइवर के बारे में ज्यादा जानता है।'' 
मैंने कुछ पैसे डोनेशन बॉक्स में डाले और ड्राइवर ऑटो लेकर चला गया। मैंने गार्ड से उसके बारे में पूछा। पता चला कि आटो ड्राइवर लड़के के चार भाई-बहन हैं। पिता की मौत हो चुकी है, बड़ा भाई पैरालाइज्ड है और दो छोटी बहनें हैं। पिछले साल अच्छे मार्क्स से पास होने पर कॉलेज सुप्रिटेंडेंट ने उसे ऑटो गिफ्ट किया था। 
पहले महीने ही उसने ऑटो चलाकर कुछ पैसे बचा लिए और सुप्रिंटेंडेंट को देने चाहे पर उन्होंने इंकार कर दिया। इसके बाद से उसने मेडिकल कॉलेज आने वाले सभी पैसेंजरों को फ्री लाना शुरू कर दिया या कुछ पैसे बॉक्स में डालने को कहता है। महीने के आखिर में बचाए हुए पैसे मेडिकल कॉलेज में इलाज कराने आए जरूरतमंदों पर खर्च करता है। 
मैं यह सब सुनकर चकित था...ये तो शहर का रियल हीरो है...भगवान उसकी मदद करे। 

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गुरुवार, जून 16, 2016

बिना किसी गाइडेंस, बिना किसी कोचिंग के बनी आई.ए.एस


3 मई की तारीख को रोज की तरह वंदना अपने घर में अपने पिताजी के ऑफिस में गई और आदतन सबसे पहले यूपीएससी की वेबसाइट खोली। वंदना को दूर-दूर तक अंदेशा नहीं था कि आज आईएएस का रिजल्ट आने वाला है, लेकिन इस सरप्राइज से कहीं ज्यादा बड़ा सरप्राइज अभी उसका इंतजार कर रहा था। टॉपर्स की लिस्ट देखते हुए अचानक आठवें नंबर पर उसकी नजर रुक गई। आठवीं रैंक. नाम- वंदना. रोल नंबर-029178. बार-बार नाम और रोल नंबर मिलाती और खुद को यह यकीन दिलाने की कोशिश करती कि यह मैं ही हूं... हां, वह वंदना ही थी। 
वंदना की आंखों में इंटरव्यू का दिन घूम गया। दुबली-पतली सी लड़की यूपीएससी की बिल्डिंग में इंटरव्यू के लिए पहुंची। शुरू में थोड़ा डर लगा था, लेकिन फिर आधे घंटे तक चले इंटरव्यू में हर सवाल का आत्मविश्वास और हिम्मत से सामना किया। बाहर निकलते हुए वंदना खुश थी, लेकिन उस दिन भी घर लौटकर उसने आराम नहीं किया। किताबें उठाईं और अगली आइएएस परीक्षा की तैयारी में जुट गईं। 
यह रिजल्ट वंदना के लिए तो आश्चर्य ही था। यह पहली कोशिश थी। कोई कोचिंग नहीं, कोई गाइडेंस नहीं. कोई पढ़ाने, समझने, बताने वाला नहीं। आइएएस की तैयारी कर रहा कोई दोस्त भी नहीं। यहां तक कि वंदना कभी एक किताब खरीदने भी अपने घर से बाहर नहीं गईं। एक साल तक अपने कमरे में बंद होकर सिर्फ और सिर्फ पढ़ती रहीं।’’ 
वंदना का जन्म हरियाणा के नसरुल्लागढ़ गांव के एक बेहद पारंपरिक परिवार में हुआ। उनके घर में लड़कियों को पढ़ाने का चलन नहीं था। उनकी पहली पीढ़ी की कोई लड़की स्कूल नहीं गई थी। वंदना की शुरुआती पढ़ाई भी गांव के सरकारी स्कूल में हुई। वंदना के पिता महिपाल सिंह चौहान कहते हैं- ‘‘गांव में स्कूल अच्छा नहीं था, इसलिए अपने बड़े लड़के को मैंने पढऩे के लिए बाहर भेजा। बस, उस दिन के बाद से वंदना की भी एक ही रट थी - मुझे कब भेजोगे पढऩे ?’’ 
महिपाल सिंह बताते हैं कि शुरू में तो मुझे भी यही लगता था कि लड़की है, इसे ज्यादा पढ़ाने की क्या जरूरत. लेकिन मेधावी बिटिया की लगन और पढ़ाई के जज्बे ने उन्हें मजबूर कर दिया। वंदना ने एक दिन अपने पिता से गुस्से में कहा, ‘‘मैं लड़की हूं, इसीलिए मुझे पढऩे नहीं भेज रहे।’’ महिपाल सिंह कहते हैं, ‘‘बस, यही बात मेरे कलेजे में चुभ गई. मैंने सोच लिया कि मैं बिटिया को पढ़ने बाहर भेजूंगा।’’ 
छठी क्लास के बाद वंदना मुरादाबाद के पास लड़कियों के एक गुरुकुल में पढऩे चली गई। वहां बहुत ही कड़े अनुशासन में रहना पड़ता, खुद ही अपने कपड़े धोना, कमरे की सफाई करना और यहां तक कि महीने में दो बार खाना बनाने में भी मदद करनी पड़ती थी। हरियाणा के एक पिछड़े गांव से बेटी को बाहर पढऩे भेजने का फैसला महिपाल सिंह के लिए भी आसान नहीं था। वंदना के दादा, ताया, चाचा और परिवार के तमाम पुरुष इस फैसले के खिलाफ थे। वे कहते हैं- ‘‘मैंने सबका गुस्सा झेला, सबकी नजरों में बुरा बना, लेकिन अपना फैसला नहीं बदला।’’ 
10वीं के बाद ही वंदना की मंजिल तय हो चुकी थी। वो कॉम्प्टीटिव मैग्जीन में टॉपर्स के इंटरव्यू पढ़तीं और उसकी कटिंग अपने पास रखतीं। किताबों की लिस्ट बनातीं, कभी भाई से कहकर तो कभी ऑनलाइन किताबें मंगवाती। बारहवीं तक गुरुकुल में पढ़ने के बाद वंदना ने घर पर रहकर ही लॉ की पढ़ाई की। कभी कॉलेज नहीं गई। परीक्षा देने के लिए भी पिताजी साथ लेकर जाते थे। 
गुरुकुल में सीखा हुआ अनुशासन एक साल तैयारी के दौरान काम आया। रोज तकरीबन 12-14 घंटे पढ़ाई करती. नींद आने लगती तो चलते-चलते पढ़ती थी. वंदना की मां मिथिलेश कहती हैं - ‘‘पूरी गर्मियां वंदना ने अपने कमरे में कूलर नहीं लगाने दिया, कहती थी, ठंडक और आराम में नींद आती है.’’ वंदना गर्मी और पसीने में ही पढ़ती रहती ताकि नींद न आए। 
वंदना ने बाहर की दुनिया कभी देखी ही नहीं। कभी हरियाणा के बाहर कदम नहीं रखा, कभी सिनेमा हॉल में कोई फिल्म नहीं देखी, कभी किसी पार्क और रेस्तरां में खाना नहीं खाया, कभी दोस्तों के साथ पार्टी नहीं की, कभी कोई बॉयफ्रेंड नहीं रहा, कभी मनपसंद जींस-सैंडल की शॉपिंग नहीं की। अब जब मंजिल मिल गई है तो वंदना अपनी सारी इच्छाएं पूरी करना चाहती है, घुड़सवारी करना चाहती है और निशानेबाजी सीखना चाहती है. खूब घूमने की इच्छा है।
आज गांव के वही सारे लोग, जो कभी लड़की को पढ़ता देख मुंह बिचकाया करते थे। वंदना की सफलता पर गर्व से कह रहे हैं- ‘‘लड़कियों को जरूर पढ़ाना चाहिए। बिटिया पढ़ेगी तो नाम रौशन करेगी।’’ यह कहते हुए महिपाल सिंह की आंखें भर आती हैं, वे कहते हैं- ‘‘लड़की जात की बहुत बेकद्री हुई है। इन्हें हमेशा दबाकर रखा, पढऩे नहीं दिया। अब इन लोगों को मौका मिलना चाहिए।’’ मौका मिलने पर लड़की क्या कर सकती है, ये वंदना ने करके दिखा ही दिया है। 
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शाबाश वंदना तुम पर हमें गर्व है
बहुत-बहुत बधाई !


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रविवार, जून 12, 2016

जहाँ बकरियां पेड़ों पर दिखती हैं

ये फोटोशॉप का कमाल नहीं है जी ! 

उत्तरी अफ्रीका का मोरक्को एक ऐसा देश है, जहां बकरियां पेड़ों पर चढ़ जाती हैं। ऐसे दृश्य मोरक्को में अक्सर दिखाई पड़ते हैं, वहां दर्जनों की संख्या में बकरियां पेड़ों पर मौजूद मिलती है। ये कौवों की तरह पेड़ की चोटी पर भी बैठी दिखती है। 


कहते हैं कि तेज ढलानों वाले इलाकों और पहाड़ों पर आते-जाते बकरियां पेड़ों पर चढ़ने के काबिल बनती हैं। बकरियों को खाने की तलाश में पहाड़ों पर जाना पड़ता है। क्योंकि मोरक्को के ज्यादातर इलाके काफी सूखे और रेगिस्तान वाले हैं, इसलिए बकरियों को जमीन पर खाना कम ही मिल पाता हैं। पेड़ पर चढ़ने के पीछे भी पेट भरना ही मुख्य वजह है। 


कम उम्र से ही ऐसा करने की वजह से बकरियां धीरे-धीरे स्किल्ड हो जाती है। यहां आर्गन ट्री नाम का फलों का एक पेड़ पाया जाता है जिस पर बकरियां अक्सर जाती है। एक आर्गन ट्री करीब 8 से 10 मीटर ऊंचा होता है।  


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बुधवार, सितंबर 09, 2015

सफाई कर्मचारी की बेटी ने 15 साल की उम्र में किया M.Sc.

जब कुछ करने का जज्बा हो, तो परेशानियां भी रास्ता छोड़ देती है। इस बात को फिर से साबित कर दिया है सुषमा वर्मा ने. मात्र 15 साल की उम्र में उन्होंने माइक्रोबायोलॉजी में एमएससी कर लिया है। 
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13 साल की उम्र में उन्होंने लखनऊ यूनिवर्सिटी से बीएससी किया था। सुषमा के पिताजी तेज बहादुर दो साल पहले मजदूरी करते थे और परिवार आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। आर्थिक मदद के लिए बीबीएयू के वाइस चांसलर डॉ. आरसी सोबती ने आठवीं पास बहादुर को यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट सुपरवाइजर की नौकरी दी। 
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सुषमा एग्रीकल्चर माइक्रोबायोलॉजी में पीएचडी करना चाहती
हैं। 2005 में सुषमा ने नौवीं क्लास में सेंट मीरा इंटर कॉलेज में एडमिशन लिया था, तब वे सिर्फ पांच साल की थीं। 2007 में लिमका बुक ऑफ रिकॉर्ड्स ने उन्हें 10वीं पांस करने वाली सबसे कम उम्र की स्टूडेंट घोषित किया ! उस वक्त वे सात  साल, तीन महीने और 28 दिन की थीं।
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सुषमा के लिए वह दौर मुश्किल से भरा था, जब उन्होंने डॉक्टर बनने के लिए उत्तर प्रदेश कंबाइंड प्रीमेडिकल टेस्ट (CPMT) में हिस्सा लिया था, मगर उनका रिजल्ट रोक दिया गया. आरटीआई डालने पर भी कोई जवाब नहीं दिया गया था। 
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इसके बाद सुषमा ने लखनऊ यूनिवर्सिटी से बीएससी किया और वहीं से बॉटनी में दिलचस्पी शुरू हुई। अपनी मेहनत और काबिलियत के बल पर सुषमा लगातार कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ रही हैं। 
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End
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मानवता को समर्पित एक शख्स


करीब तीस साल का एक युवक मुंबई के प्रसिद्ध टाटा कैंसर अस्पताल के सामने फुटपाथ पर खड़ा था। युवक वहां अस्पताल की सीढिय़ों पर मौत की दहलीज पर खड़े मरीजों को बड़े ध्यान दे देख रहा था, जिनके चेहरों पर दर्द और विवषता का भाव स्पष्ट नजर आ रहा था। इन रोगियों के साथ उनके रिश्तेदार भी परेशान थे। 
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वहां मौजूद रोगियों में से अधिकांश दूर दराज के गांवों के थे, जिन्हे यह भी नहीं पता था कि क्या करें, किससे मिले? इन लोगों के पास दवा और भोजन के भी पैसे नहीं थे। टाटा कैंसर अस्पताल के सामने का यह दृश्य देख कर वह तीस साल का युवक भारी मन से घर लौट आया। उसने यह ठान लिया कि इनके लिए कुछ करूंगा। कुछ करने की चाह ने उसे रात-दिन सोने नहीं दिया। अंतत: उसे एक रास्ता सूझा.. 
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उस युवक ने अपने होटल को किराये पर देक्रर कुछ पैसा उठाया। उसने इन पैसों से ठीक टाटा कैंसर अस्पताल के सामने एक भवन लेकर धर्मार्थ कार्य (चेरिटी वर्क) शुरू कर दिया। 
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उसकी यह गतिविधि अब 27 साल पूरे कर चुकी है और नित रोज प्रगति कर रही है। उक्त चेरिटेबिल संस्था कैंसर रोगियों और उनके रिश्तेदारों को निशुल्क भोजन उपलब्ध कराती है। करीब पचास लोगों से शुरू किए गए इस कार्य में संख्या लगातार बढ़ती गई। मरीजों की संख्या बढऩे पर मदद के लिए हाथ भी बढऩे लगे। सर्दी, गर्मी, बरसात हर मौसम को झेलने के बावजूद यह काम नहीं रूका। 
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यह पुनीत काम करने वाले युवक का नाम था हरकचंद सावला।
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एक काम में सफलता मिलने के बाद हरकचंद सावला जरूरतमंदों को निशुल्क दवा की आपूर्ति शुरू कर दी। इसके लिए उन्होंने मेडिसिन बैंक बनाया है, जिसमें तीन डॉक्टर और तीन फार्मासिस्ट स्वैच्छिक सेवा देते हैं। 
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57 साल की उम्र में भी सावला के उत्साह और ऊर्जा 27 साल पहले जैसी ही है। मानवता के लिए उनके योगदान को नमन करने की जरूरत है। यह विडंबना ही है कि 10 से 12 लाख कैंसर रोगियों को मुफ्त भोजन कराने वाले को कोई जानता तक नहीं। यहां मीडिया की भी भूमिका पर सवाल है, जो सावला जैसे लोगों को नजर अंदाज करती है। 
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यह हमे समझना होगा कि शिरडी में साई मंदिर, तिरुपति बाला जी आदि स्थानों पर लाखों रुपये दान करने से भगवान नहीं मिलेगा। भगवान हमारे आसपास ही रहता है। लेकिन हम बापू, महाराज या बाबा के रूप में विभिन्न स्टाइल देव पुरुष के पीछे पागलों की तरह चल रहे हैं। 
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End
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मंगलवार, दिसंबर 23, 2014

लाल बहादुर शास्त्री से जुड़ा एक सच्चा प्रसंग

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श्री लाल बहादुर शास्त्री जी के बारे में कुछ बताने की आवश्यकता नहीं है। मगर उनमें वो बात थी कि ज़माना आज भी उनको याद करता है - वो था उनका आदर्श, उनके मूल्य, संस्कार के प्रति उनका समर्पित जीवन। ===================================================================

अनिल शास्त्री ,दिल्ली के किसी कालेज में admission के लिए फ़ार्म भर रहे थे। उस समय उनके पिता श्री प्रधानमंत्री बन चुके थे। मगर अनिल जी ने एक सामान्य विद्यार्थी की हैसियत से लाईन में खड़े हो कर अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होने अपना नाम और पहचान छुपाने की गरज से और उन्हें पिता की हैसियत का कोई अनावश्यक [undue] लाभ न मिले बल्कि ’प्रतिभा ’के बल पर admission मिले इस लिये नाम के पीछे ’शास्त्री’ नहीं लिखा। 
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पिता के occupation वाले column में Government servant लिखा था जब उनका नम्बर आया और वह counter पर पहुंचे तो फ़ार्म check कर रहे व्यक्ति [शायद कोई robert साहब थे] ने फ़ार्म देखा, पता देखा 10-जनपथ न्यू दिल्ली तो चौंक गया ! सोचा, यह तो ’प्रधान मंत्री’ निवास का पता है .. तो फिर इस लड़के के पिता वहाँ क्या काम करते है - PA है कि PS है कि security officer है कि peon है कि कौन सा Govt servant है। Robert महोदय दुविधा में पड़ गये और पुचकारते हुए पूछा -’बेटा, papa वहां क्या करते हैं- कौन सा Govt servant है? 
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अनिल जी से यह बात अब छुपाये न छुपे और बड़े ही संकोचवश धीरे से बोले- पापा भारत के प्रधानमंत्री हैं 
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इतना सुनते ही राबर्ट महोदय एकायक खड़े हो गये ..आनन फ़ानन में फ़ार्म लिया कार्रवाई पूरी की ,फिए अनिल को लेकर principal साहब के कमरे में ले गया और बड़े ही सीना तान कर और जैसे कि कोई तोप चीज़ हाथ में लग गई, कहा- "सर, देखिए, हमारे कालेज में कौन आया है, सर प्रधानमंत्री का बेटा ..अपने प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी का..." अनिल जी झेंप गये .. यह था उनका संस्कार ... 
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ख़ैर.. 
घर लौटने पर अनिल जी ने यह बात अपने पिता जी को बताया तब श्री लाल बहादुर जी ने बस दो बात कही - "पहली बात तो ठीक है कि पूछने पर तुमने अपने पिता का नाम बताया ,,, दूसरी बात ग़लत है कि राबर्ट तुम्हारा परिचय कराने प्रिन्सिपल के कमरे में ले गए। वह क्या और बच्चों को भी प्रिन्सिपल से परिचय कराने ले गए थे। नहीं तो यह बात ग़लत है" 
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यह था एक पिता का पुत्र को दिया हुआ संस्कार .. मूल्यों के प्रति समर्पण और आज??? 
आज तो सरपंच का लड़्का भी अपने को प्रधानमंत्री से बड़ा समझता है
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The End 
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सोमवार, जुलाई 29, 2013

यह फ़िल्म की कहानी नहीं हकीकत है



पिता डकैत, लेकिन बेटा पुलिस या सेना में, पिता कानून के खिलाफ काम करता है, लेकिन बेटा कानून की रक्षा की कसम खाता है ऐसे वाकये आपने अब तक फिल्मों में ही देखे होंगे। लेकिन ये कहानी हकीकत बनती दिखाई दी


मेरठ में एक ऐसे शख्स ने दरोगा की भर्ती परीक्षा पास की है, जिसके पिता को कुख्यात डकैत के रुप में जाना जाता था । 80 के दशक में चंबल के बीहड़ों में आतंक मचाने वाले डकैत छविराम सिंह को पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया था। और इतने सालों बाद छवि राम सिंह के बेटे अजयपाल सिंह ने दरोगा के रूप में देशसेवा की कसम खाई। खास बात ये है कि अजय को शपथ दिलाने वाले अफसर उसी एनकाउंटर टीम का हिस्सा थे, जिसने डकैत छवि राम सिंह को ढेर किया था।


अजयपाल को ये सारी हकीकत मालूम है, उसका कहना है कि मुझे अपने पिता पर गर्व है, मेरे पिता ने कभी महिलाओं से या बच्चों से लूटपाट नहीं की न उन्हें तंग किया। महिलाओं से गहने भी नहीं उतरवाते थे, मैं टीचर या वकील बनना चाहता था, लेकिन मैनपुरी के एक एसएसपी ने मेरी लगन देखकर मुझे पुलिस में भर्ती कराया।

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The End 

फेसबुक मित्रों द्वारा की गयीं कुछ प्रतिक्रियाएं
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Praveen Chauhan : 
अनुकरणीय … युवाओं को प्रेरणा लेनी चाहिए. 
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Prathvipal Singh :
परिस्थितियोँ को दिल से समझने वाले हमेशा जीत हासिल करते है ..परिस्थितियाँ इंसान को कब कहाँ कैसे मुकाम दे ...  
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Ajeet Yadav :
बस इसी तरह के बदलाव से भारत आधुनिक बन पायेगा, जहां किसी भी व्यक्ति को उसकी खुद की क्षमताओं एवं कर्मों से आंका जाएगा ना की उसके पूर्वजों के कर्मों से.  
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शिशिर जैन :  
बहुत अच्छे बदलाव के संकेत हैं ... 
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Firdaus Khan :
बदलाव की ये बयार हमेशा यूं ही बहती रहनी चाहिए...   
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Goldy Sadh : 
bahut sukhad anubhuti hui jaankar ki desh me aise yuwa aaj bhi hain.... 
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Arshad Iqbal :
Kaash ! Hamare Desh men Har Yuwa ki Soch aur Samajh is Tarah ki Ho jaaye...  
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कलीम अव्वल :
ये ख़बर पढी थी / फ़िल्मी कहानी जैसी ही है / लेकिन / एक सुखद सच्चाई / अजय पाल की हिम्मत की तारीफ़ की जानी चाहिए /कि/ एक पंकिल अतीत के साथ जीते हुए भी यहां तक पहुचे / बहुत-बहुत बधाई / और खूब आगे बढ़ें .  
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Jyoti Prakash Verma :  
bahut accha hai bhayi.....jaruri nahi ki apradhi ka beta apradhi hi bane.....inko to samman jarur milna chahiye jinhone apne pariwarik mahaul se oopar uthkar samaaj ke liye kuchh karne ka jajba man me rakh kar force me shaamil hote hain..... 
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Faqir Jay :
भारतीय समाज में ये बदलाव बड़ा खुशनुमा है   
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Ashutosh Pandey : 
गोविन्द जी यह समाचार मैंने भी पढ़ा अखबार में ...अजयपाल को बधाई ...उसके पिता छविराम सतयुग के डकैत थे जिन पर शायद आज की कलियुगी पुलिस की छवि तो दूर छाया भी नहीं रही हो सकती है ....ऊपरवाला चाहे सबको सतयुगी डकैत भले ही बना दे परन्तु कलियुगी पुलिस से जरूर बचाए जिसकी साख से पूरा देश वाकिफ है कहीं-कहीं तो साक्षात् यमराज ...... थोड़ा लिखा बहुत समझिएगा ... जय जय सतयुगी की 
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पवन कुमार जैन :
बहुत उम्दा शुरुआत ज़िंदगी की .... 1980 में छविराम से एक बार मेरी मुलाकात गुरसहायगंज में एक शादी के दौरान हुई थी .. जब वह लड़की को आशीर्वाद देने आए थे ...  
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रमा शंकर शुक्ल :
Waah Ajay Pal, tujhe salaam.  
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Krishna Pandey :  
Hats off... Yeah Badalate Jeevan Ki Tasveer hai Aur Ek Suruaat bhi....  
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Wasim Akram Tyagi :
सलाम इस मेरठी छोरे को ... 
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पांच पतियों वाली कलयुग की द्रोपदी

पुरुष मानसिकता वाले समाज में आप यह खबर पढ़कर चौंक जाएंगे कि एक महिला के पांच पति और सभी के सभी आपस में सगे भाई हैं। यह परिवार आपस में काफी खुश है और मिल-जुलकर रहता है।

राजो और उसके पहले पति गुड्डू की शादी चार साल पूर्व हिंदू रीति-रिवाजों के साथ हुई थी। इसके बाद राजो ने अन्य भाइयों बैजू [32 साल], संत राम [28 साल], गोपाल [26 साल] और दिनेश [19 साल] के साथ विवाह किया। दिनेश के 18 साल के होने पर उसने अपना पांचवां ब्याह रचाया। 21 साल की राजो वर्मा को यह नहीं मालूम कि 18 महीने के उसके बेटे का बाप पांच पतियों में से कौन हैं।

सदियों पहले प्राचीन भारत में कई जगहों पर बहुपति प्रथा कायम थी लेकिन आज केवल एक अल्पसंख्यक समाज में ही यह परंपरा है। इस परंपरा के पीछे यह माना जाता है कि इससे परिवार में जमीनों का बंटवारा नहीं होगा और परिवार आपस में एकजुट बने रहेंगे।

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The End 
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फेसबुक मित्रों द्वारा की गयीं चुनिंदा प्रतिक्रियाएं
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Manish Gupta : 
वैसे भी अगर ये समाज बेटियों का दुश्मन बना रहा तो एक दिन हर जगह ये आम बात होगी।
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Markandey Pandey :
पोलीगेमी का समय आ रहा है जिसप्रकार से सेक्‍स रेशियों कम हो रहा है। 
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Neeraj Jat :
किन्नौर, जौनसार और तिब्बत में यह प्रथा पहले बडे पैमाने पर थी... अब खत्म होने लगी है।
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Pooja Jaiswar :  
kuchh scheduled tribes me abhi bhi hota hai. 
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Preetam Thakur :
ऐसे रिवाज किनौर हिमाचल में भी है   
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नैनी ग्रोवर : 
हाँ ऐसे गाँव आज भी हैं .. हिमाचल में भी जहाँ यह प्रथा अब भी है पिछले दिनों डिस्कवरी पर 1 घंटे की स्टोरी दी थी 
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Gyasu Shaikh :
is purush maansikta mein bhugatna stree ko hi padta hai ! yahan uska sir aur sirf istemaal hi hota hai...  
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Shiv Shambhu Sharma :
महाभारत के बाद यह प्रथा यदा कदा पंजाब व राजस्थान के कुछ ग्रामीण अंचलों के हिस्सों में यह प्रथा कमोवेश आज भी सुनने को मिलता है इसका प्रधान कारण खेतो का बंट्वारा होने पर की असुरक्षा की भावना और लडकियो की संख्या पुरूषों के बनिस्पत कम होना और संयुक्त परिवार के स्थायित्व की भावना का होना है बहरहाल यह एक कुप्रथा है एक स्त्री की मानसिक और शारीरिक उपभोक्तावाद की शर्मनाक स्थिति है ।  
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Deepak Sharma :  
so sad. kisi stree ka paanch paanch log milkar soshan kare toh yeh pratha kaisi ? yeh sab dekh kar lagta hai ki hum ab bhi sabse peechhe hain. na koi kaanun, na koi vyvastha. lagta hain ki bharat ki sarkar hi illiterate hai jo public ko apne hisaab se haankti hai. 
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Shiv Shambhu Sharma :
यह प्रथा इसलिये कहा गया है क्योकि इसे वह गांव समाज परिवार ही स्वीकार नही करता अपितु वह स्त्री (अनपढ) जो यह सहन करती है उसकी भी सहमति होती है ।
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Deepak Sharma : 
Shiv Shambhu bhayi agar koi stree 'love marriage' karna chahe toh yeh samaj usko pata nahi kya kya gaali deta hai. jabki wahan wo ek insaan ko apna jeevan saathi banana chahti hai aur yaha samaaj kya kar raha hai ?
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Shiv Shambhu Sharma :
@Deepak Sharma jee भाइ यह हमारे समाज की विभिन्नताओं से भरी जातिगत जटिल रूढिगत सामाजिक सोच को पालने और पुरोहितवाद के कारण है वैसे शास्त्रो मे गंधर्व विवाह आदि का प्रावधान है लेकिन वे तब के पुरोहित थे ये अब के।  
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Avdhesh Nigam :
कुन्ती अगर अपने पाँच पुत्रों के लिए पाँच औरतें लातीं तो वे पाँचों उन्हें नोच नोच कर खा जातीं | पाँचों पुत्रों को बांधकर रखने का नायब तरीका खोजा था कुन्ती ने|  और इसे "कुन्ती विवाह " का नाम दिया जाना चाहिए| अगर यह व्यवस्था कुन्ती ने न की होती तो पांडव कभी खोया हुआ राज्य एवं वैभव पुनः प्राप्त नहीं कर पाते| 
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Ashutosh Pandey :  
इस प्रकार की व्यवस्था का इतिहास जिस भी कारणवश व जैसी भी स्थितिवश रहा हो परन्तु आज नई सदी में विकासशील भारत सरकार को मंथन कर इस जैसी स्तिथि का भविष्य निर्धारण अवश्य ही करना चाहिए 
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Chandrashekher Giri :
तीन तस्वीरें हैं, तीनो मे जितने भी सदस्य हैं खुश दिखाई दे रहे हैं ……… फ़िर क्या समस्या है। ओवर थिंकर परेशान रहते हैं और दूसरो को भी परेशान करते हैं।   
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Ahmad Kamal Siddiqui : 
अगर प्यार मुहब्बत बना रहे और घर ना टूटे तो क्या बुरा है ..... 
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Danda Lakhnavi :
भारत में बहु-पत्नीवाद और बहु-पतिवाद दोनों व्यवस्थाएं रही हैं| शास्त्रों में इसे जायज ठहराया गया है| प्राय: राजतंत्र में चल-अचल सभी प्रकार की सम्पत्तियों का स्वामी राजा होता था| उसका स्वामित्व स्त्री-पुरुषों की देह पर भी रहा करता था| वह विवेकानुसार अपने अधीन संपत्तियों का भोग करता था| कई-कई क्षेत्र में ऐसी परंपरा देखने में आई है कि प्रजावर्ग के किसी पुरुष की शादी होने पर वर के घर जाने के पूर्व वधू को ..... एक रात राजा के घर पर बिताना होता था| इस प्रथा के भय से प्राय: माता-पिता ... अपने पाल्यों का बालविवाह कर दिया करते थे| हिंदू-कोड बिल में डॉ. भीम राव अम्बेडकर ने नारियों से संबंधित इस प्रकार की अनेक समस्याओं का समाधान सुझाया था.... जो उनके जीवन काल में पारित नहीं हो सका| बाद में टुकडों-टुकडों में उसे अबतक पारित करने की कवायद चल रही है 
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Archna Upadhyay :
स्त्री को सम्पति मानने वाली किसी भी परम्परा का हम समर्थन नहीं कर सकते !  
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Puneet Bisaria :  
हिमाचल प्रदेश के के कुछ इलाकों, उत्तराखंड और पंजाब में ये परंपरा है। आदिवासी और पिछड़ा समाज की संपत्ति न बंटे, इसलिए ऐसा करता है। 
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Danda Lakhnavi  :
@ Archna Upadhyay जी! हमारे धार्मिक ग्रंथ स्त्रियों को संपत्ति मानते हैं... उनमें संशोधन नहीं हुआ है ... भारतीय संविधान आपको मौलिक अधिकार देता है ...   
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Archna Upadhyay : 
ऐसे धार्मिक ग्रन्थों को हम नहीं मानते, और स्त्रीयों के नौ रूप इन्ही ग्रन्थों में हैं, माँ का रूप सर्वोपरी है. 
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Reetesh Khare :
पर चलिए यह समाचार बहुत ही सुखद है ... और आम समाज के हिसाब से बहुत ही ख़ास :-)   यहाँ मौजूद तमाम विचारों को पढ़ के विचारों के चक्षु कुछ और खुले...काफी जनों ने बाकायदा रोष और विरोध प्रकट किया है इस अनेक पतित्व के उदाहरण के प्रति. चूंकि बहुतायत में नारियों का शोषण तो निः संदेह हुआ होगा और आज भी हो रहा है... इसलिए आम फहम तो इसे कुरीति का दर्जा ही मिलेगा. पर इस परिवार विशेष के उदाहरण के अंतर्गत मैं पुनः इसे सुखद समाचार ही मानना चाहूँगा. 
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Pramod Kumar :
जहाँ निश्छल प्यार हो वहां कुछ भी संभव है। जहाँ प्यार में स्वार्थ और अपेक्षाएं छुपी हों वहां परिवार का कोई रिश्ता सफल नहीं हो सकता।  
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Danda Lakhnavi  :  
@ Pramod Kumar जी! समस्या प्यार-मोहब्बत तक नहीं है ... यह बाद में होने वाली संतानों के भरण-पोषण की है| माता पिता के न रहने पर उत्तरदायित्व के निर्वाह की है 
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Pramod Kumar :
Dear Danda Lakhnavi Ji. लोग तो आज कुत्तों बिल्लियों को पाल लेते हैं शायद इंसान में उन्हें सच्चा प्यार नहीं दिखता .........। ऐसा कैसे हो सकता है की पाँचों माँ बाप न रहें । यहाँ तो माँ बाप के ज्यादा options हैं । मैं किसी परंपरा या रीती की पैरवी या वकालत नहीं कर रहा बल्कि निश्चल स्नेह की ओर इशारा कर रहा हूँ ।   
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Satish Diwan : 
Aisi parampara ko jaayaz thahrana aaj ke samaaj me kahin bhi uchit nahi lagta, jis aarthik aur ek jut-ta ko uddeshy bana kar aap ise pyar mohabbat ki misaal bata rahe hain, ye to agyanta aur mahabharat ke yug ki baaten hain, abhi 21wi sadi men aisi parampara nazayaj hai... 
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Aradhana Chaturvedi :
ये आश्चर्य की बात नहीं है. मुझे बहुत पहले से पता है कि हिमाचल के कुछ अंचलों में 'बहुपति' प्रथा आज भी कायम है.  
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योगेन्द्र राणा :
है ये प्रथा अब भी कुछ एरिया में है अगर कहा जाये तो ये यहाँ पर शिक्षा के अभाव के कारण है ... अधिकतर पहाड़ो के एरिया में ये प्रथा आप को मेलेगी.   
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Vishesh Jain :  
ye har lihaaz se bahut hi ghatiya parampara thi, hai aur rahegi. Aurat ko iss tarah paanch pusrushon mein, prasaad ki tarah baant dena, naa sirf aurat ke vyaktitva apitu uske sampoorna jeevan par ek gehra prahaar hai. Aurat ko itna nirarthak aur shoonya-astitava ka jaama, shayad aisi hi vikrut paurush-maansikta ka nateeja hai. 
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Avnish Pandey :
कन्या हत्या इसी तरह होती रही तो यह मजबूरी हो जायेगी.  
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Vishal Shah : 
Save Girl child or be ready for similar future!!! 
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रमा शंकर शुक्ल :
arey gajab bhaiya. us mahila ke sath sabhi purushon ko badhayi, jinhone samaaj ki visangatiyon ko kinare kar prem aur soojh-boojh ki anupam misaal di. ham unke sath hain.  
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Rekha Srivastava :
koyi bhi samaaj ho aisi pratha na naari ke liye uchit hai aur na hi usake aane waali santaan ke liye. us stree ke bare men koyi doosara nahin soch sakata hai. phir jo hamari manasikata ladakiyon ke prati chal rahi hai (han abhi bhi badali nahin hai) us se bhavishya men sab mil-jul kar nahin rahenge balki ek ladaki ke liye hatyaayen hongi aur tab bhi kisi kee patni surakshit na rahegi.  
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Prakash Govind :  
रेखा जी आपसे सहमत हूँ ... आगे चलकर ढेरों समस्याएं उत्पन्न होंगी ... इनमें आपस में ही संघर्ष होगा .. मार-काट होगी ...ऐसे परिवार से उत्पन्न संतानों को समाज कभी सम्मान नहीं देगा ... वे कुंठाओं में जियेंगे .. ! सरकार को तत्काल इस कुप्रथा पे रोक लगानी चाहिए ! 
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Tarif Daral :
यह प्रथा उत्तरकाशी क्षेत्र के गावों में प्रचलित है।   
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Joshu Nishant :  
Bahupati pratha Himachal Pradesh ke kuchh ilakon mein dekhne ko milti hai.. 
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Govind Singh Parmar :
अटपटा जरूर लगा, लेकिन लडको और लडकियों का अनुपात 1000:900 हो गया है कुछ सालो बाद ये 1000 पर 200 भी पहुचेगा, तब यही विकल्प होगा, मै इसे बहुत बुरा नहीं मानता, मेरी समझ में इसमें महिला उपभोग की वस्तु न होकर पुरुष है और ऐसी स्थितिओ में महिला कभी दबकर नहीं रह सकती, मुझे तो ये सुखद लगा   
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Sunil Mishra Journalist :  
samajik asuraksha ke chalte...ku-pratha janm leti hai....ladkiyon ka ghat-ta anupaat bhi wajah aur isake pichhe bhi samaj hai.....U.P, West aur Hariyana men pratha jinda hai...aapne achchhi reporting ki hai... 
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Rosey Insan :
what the hell is this ????? aaj-kal ke time men aisa bhi hota hai. its strange   
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Ratan Singh Bhagatpura :  
यदि कन्या भ्रूण हत्याएं रुकी नहीं और बढती रही तो ऐसे दृश्य अल्पसंख्यक समाज में ही नहीं सभी समाजों की जरुरत बन जायेंगे !! 
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Mohammed Tarique Azmi :
kisi ek samaaj ko alpasankhyak ka darja kaise de sakte hain ? ye pratha galat thi hai aur rahegi. jahan tak kunti ki baat hai bhagwaan jane kya sahee kya galat bin byaahe karn ko janm de diya aur fenk diya .. aarop bechare soorya par laga diya ki aakar bachcha dekar chale gaye......   
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Malik Rajkumar :  
Dehradoon ke paas 'Lahkaa Mandal' men yah prathaa aaj bhi hai bhayi. 
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Mukesh Kain :
कमाल है गोविन्द जी, जब आज के जमाने में एक आदमी अनेक की तरफ भागता है, ये अनेक एक से संतुष्ट है ... धन्य है ये सच्चे पत्नी व्रता है !   
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रामकिशोर पवार बैतूल :  
शर्मसार कर देने वाली घटना है। समझ के बाहर की बात है कि यह स्वेच्छीक है या बलपूर्वक लेकिन इस कार्य की निंदा की जाए या फिर उस नारी का सम्मान समझ के बाहर की बात है। अगर हम इसकी निंदा करते है तो फिर हमें द्रोप्रदी की भी निंदा करनी चाहिए ..! 
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Jogeshwar Garg  :
देश में कन्या भ्रूण हत्या जारी रही और कन्याओं की संख्या ऐसे ही घटती रही तो ...........   
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Vandana Awasthi Dubey :  
ये प्रथा राजस्थान के एक इलाके में अभी भी प्रचलित है, जहां एक भाई की शादी होने पर बहू बाकी भाइयों की पत्नी स्वत: ही हो जाती है वो भाई पांच साल का ही क्यों न हो. हमारे देश के तमाम प्रांत आदिवासी बहुल हैं. ये हिस्से इतने अन्दर हैं, कि वहां पहुंच रास्ते तक अभी ठीक से निर्मित नहीं हुए हैं. इन हिस्सों में ये परम्पराएं अपने मूल रूप में विद्यमान हैं. मसलन बस्तर, अबूझमाड़, छोटा नागपुर विदर्भ और राजस्थान के कई हिस्से. 
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Brajesh Rana :
ladke aur ladki ka anupaat 1000:814 hai. ye hi halaat rahe to ye sthiti kaheen bhee ho saktee hai. Haryana is importing girls from other poor states or Bengal and Odesha.   
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Prakash Govind  :  
अगर 1000 लड़कों की तुलना में 814 लड़कियां हैं तो दस करोड़ लड़कों पर आठ करोड़ चौदह लाख लड़कियां हुयीं .... इस तरह एक करोड़ छियासी लाख लड़कों का क्या होगा ???? बहुत डराने वाला आंकड़ा है. एक करोड़ छियासी लाख तो सिर्फ दस करोड़ पर है .... देश की आबादी तो एक सौ पच्चीस करोड़ है ..... बारह करोड़ से ज्यादा युवकों का सोचिये
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शुक्रवार, जुलाई 26, 2013

जाकिर नाइक की जाहिलाना बातें


"आपने कितना भी बड़ा गुनाह किया हो ... चोरी की, डाका डाला, बलात्कार किया है और आप खुदा पर ईमान ले आते हैं और इस्लाम कबूल करते हैं तो आपके सारे गुनाह माफ़ ! ज़न्नत सिर्फ एक कलमा पढ़कर जाया जा सकता है" 
---- जाकिर नाइक 
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एक अरसे से इस जाकिर नाइक की उल जुलूल बातें सुनता रहता हूँ … 
कम से कम मैं तो इस बन्दे को निहायत जाहिल मानता हूँ … 
हमेशा बे-सिर-पैर की तर्कहीन बातें करने वाले जाकिर नाइक को कैसे लाखों मुसलमान झेलते हैं … 
मेरे लिए ये बहुत ही ताज्जुब की बात है ! 

मेरे एक मित्र हैं जो जाकिर नाइक को विद्वान मानते हैं … 
आप लोग भी कभी इसको सुनिए और बताईये कि 
ये नफरत और ज़हालत की बात करने वाला कौन सी विद्वता की बात कहता है ?

जिस तरह की ये बातें करता है वो खुद इस्लाम के लिए ही घातक हैं ! 
आतंकवाद का असली कारखाना ऐसे ही जाहिल धर्म गुरु हैं !

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The End
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--प्रकाश गोविन्द 
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