रविवार, अगस्त 24, 2014

बिल्ली के गले में घटी ...

प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी चूहों का चिंतन शिविर चल रहा था ! चर्चा भी वही ,,,,घोषणाएं भी वही,,,समस्याएं भी वही ... कहीं कुछ भी नया नहीं !
---
अचानक ही एक सुशिक्षित युवा चूहा खड़ा हुआ और बोला -
'सभापति महोदय मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ'
---
सभापति ने माईक संभाला और गला खखारकर बोले - 'हाँ कहो'
---
युवा चूहा बोला :- बिल्ली के गले में घंटी बाँधने का विचार हमारे दादा-परदादा के समय व्यक्त किया गया था ... मैं जानना चाहता हूँ कि उस सम्बन्ध में क्या प्रगति हुयी ?
---
उत्साहित युवा चूहे की बात सुनकर सभा में उपस्थित सभी गणमान्य चूहे हंसने लगे ! एक बुजुर्ग चूहा खड़ा हुआ :- हमें बिल्ली से खतरा हमेशा बना रहेगा ,,, इस बारे में सभी पुराने उपाय सोचे जा चुके हैं ...पुरानी से पुरानी किताबों का अध्ययन कर लिया गया है ... इस बारे में चर्चा करके शिविर का कीमती समय नष्ट करने से कोई फायदा नहीं है
---
युवा चूहे ने एक बार पुनः अपनी बात रखी :- सभापति महोदय मुझे एक कोशिश की अनुमति प्रदान करें !
---
शिविर में उपस्थित सभी चूहों के चेहरों पर तंज उभर आया ! सभापति ने चर्चा को विराम देने के उद्देश्य से कहा :- ठीक है ... ठीक है .. आप करें कोशिश !
---
चिंतन शिविर के अगले दिन युवा चूहा उत्साहित मुद्रा में बोला :- सभापति महोदय मैंने महल की सबसे खतरनाक बिल्ली के गले में घंटी बाँध दी है !
---
सभापति महोदय और समस्त उपस्थित चूहों को यकीन नहीं हुआ ... दो-तीन चूहों को तत्काल जांच के लिए भेजा गया !
---
थोड़ी देर बात ही जांच करने गए चूहे वापस आये और हर्षमिश्रित आवाज़ में बोले - हाँ महोदय ...बात सही है .. बिल्ली के घंटे में घंटी बंधी हुयी है ,,,बिल्ली जैसे ही चलती है घंटी की आवाज आने लगती है !
---
सभापति महोदय ने युवा चूहे से जिज्ञाषा प्रकट की :- सभी लोग इस बात को जानना चाहते हैं कि तुमने ये काम किया कैसे ?
---
युवा चूहा खड़ा हुआ और बोला :- दरअसल आप लोग हर समस्या का समाधान पुराने तरीकों से खोजते रहे हैं ... हमारे दादा-परदादा ने क्या किया ....हमारी पुरानी किताबों में क्या लिखा है .. बस उसी का अध्ययन करते रहे .. हम क्यों नहीं नयी तरह से सोचते ... क्यों नहीं समाधान के लिए नए प्रयास करते ?
---
सभापति महोदय उबासी लेते हुए बोले :- भाषण की जरुरत नहीं ...सिर्फ ये बताओ कि घंटी बाँधी कैसे ?
---
युवा चूहा बोला :- मैंने गंभीरता से सोचा तो एक आसान तरीका सूझा ... मैं केमिस्ट के यहाँ से 3-4 नींद की दवा ले आया ... उस नींद की दवा को दूध में मिला दिया और एक कटोरी में दूध रखकर बिल्ली के घर के पास रख दिया ..... कुछ समय बाद बिल्ली वहां आई, उसने दूध पिया ... मैं छुपकर इन्तजार करता रहा ... जैसे ही बिल्ली गहरी नींद में हुयी .. बस मैंने जाकर अच्छी तरह से बिल्ली के गले में घंटी बाँध दी !!
---
सभापति महोदय बोले :- हमारे पूर्वज वाकई बहुत महान थे .. उनका ही उपाय काम आया !
=====================
The End
=====================
- फेसबुक लिंक -
https://www.facebook.com/prakash.govind/posts/850079118335721
=================================================

शनिवार, अगस्त 23, 2014

बिल गेट्स और बिहारी

बिल गेट्स ने अपने माइक्रोसॉफ्ट के कनाडा के बिज़नेस के लिए चेयरमैन की जॉब के लिए एक इंटरव्यू रखा... इंटरव्यू के लिए 5000 लोग एक बड़े होल में इकट्ठा हुए...

---
इन सब में एक कैंडिडेट पटना, बिहार से भी थे... नाम था ‘रघुवीर यादव’
---
बिल गेट्स :- इंटरव्यू में आने के लिए आप सबका शुक्रिया...
जो लोग java नहीं जानते हैं, वो जा सकते हैं
(ये सुन कर 2000 लोग रूम छोड़ कर चले गए)
---
‘रघुवीर यादव’ ने मन में सोचा, “मुझे कौन-सा ससुरी java आती है... लेकिन रुकने में ही क्या नुकसान है... देखते हैं आगे-आगे क्या होता है”
---
बिल गेट्स :- जिन लोगों को 100 लोगों से बड़ी टीम को मैनेज करने का तजुर्बा नहीं हैं, वो जा सकते हैं...
(ये सुन कर 2000 लोग रूम छोड़ कर चले गए)
---
‘रघुवीर यादव’ ने मन में सोचा, “मैंने तो ससुरी भैंस भी एक साथ 3 से ज्यादा नहीं चराई... ये 100 लोगों की टीम मैनेज करने की बात कर रहा है... लेकिन रुकने में ही क्या नुकसान है... देखते हैं आगे-आगे क्या होता है”
---
बिल गेट्स :- जिन लोगों के पास मैनेजमेंट का डिप्लोमा नहीं है, वो जा सकते हैं...
(ये सुन कर 500 लोग रूम छोड़ कर चले गए)
---
‘रघुवीर यादव’ ने मन में सोचा, “मैंने तो 8वी क्लास में ही स्कूल छोड़ दिया था... ये ससुरा डिप्लोमा की बात कर रहा है... ... लेकिन रुकने में ही क्या नुकसान है... देखते हैं आगे-आगे क्या होता है...”
---
सबसे आखिर में बिल गेट्स ने कहा :- जो लोग जापानी भाषा में बात नहीं कर सकते, वो जा सकते हैं...
(ये सुन कर 498 लोग रूम छोड़ कर चले गए)
---
‘रघुवीर यादव’ ने मन में सोचा, “मुझे तो जापानी भाषा का एक शब्द भी नहीं आता... लेकिन रुकने में ही क्या नुकसान है... देखते हैं आगे-आगे क्या होता है...”
---
अब ‘रघुवीर यादव’ ने पाया की वो खुद और सिर्फ़ एक ही और candidate इंटरव्यू के लिए बचे हैं... बाकी सब जा चुके थे...
----
बिल गेट्स उन दोनों के पास आया और उनसे कहा, “जैसा की आप देख सकते हैं कि अब सिर्फ़ आप दोनों ही हैं candidate बचे हैं जो जापानी भाषा जानते हैं... में चाहूँगा कि आप दोनों आपस में जापानी में बात करके दिखाएँ”
---
‘रघुवीर यादव’ ने धीरे से दूसरे candidate से पूछा :- “कौन जिला घर पड़ी हो..??”
दूसरे ने जवाब दिया, “छपरा... ...और तोहार ?”

==============================
The End
==============================
- फेसबुक लिंक -
https://www.facebook.com/prakash.govind/posts/848584191818547

सोमवार, अगस्त 11, 2014

आदमी और बाजार


वह जब माळ के भीतर दूकान में घुसा तो दूकान वाले ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया !
ऐसा पहली बार नहीं हुआ, पता नहीं उसके चेहरे में ऐसा क्या है कि वो दूकानदार में अपनी दिलचस्पी नहीं जगा पाता !
----
----
दुकानदार मानकर चलता है कि ये कुछ नहीं खरीदने वाला, लेकिन वो कहना चाहता है कि मैं नमक, हल्दी, चावल और साबुन तो खरीदता ही हूँ ,,, और भी तमाम चीजें ! मैंने कंप्यूटर भी खरीदा है और चश्मा तो हर साल खरीदता हूँ !
----
----
बहरहाल दूकान वालों को देखकर यह लगता है कि वे पहले से ही जानते हैं कि वो कुछ खरीदने वाला नहीं है ! इस वजह से वो दूकान में उड़ा-उड़ा सा रहता है और कई बार तो भूल भी जाता है कि वो दूकान में आया तो किसलिए !
----
----
दुकानदार लोग शायद उसे इस तरह के आदमी के तौर पर देखते हैं जिसका काम बिना खरीदे ही चल सकता है ! वे नहीं चाहते कि उस जैसा आदमी दूकान में दाखिल हो ! वे नहीं चाहते कि ऐसा आदमी बाजार में दिखे, जिसका काम बिना खरीदे ही चल जाता हो !
------------------------------------------------
The End
------------------------------------------------
- फेसबुक लिंक - 
https://www.facebook.com/prakash.govind/posts/843388052338161
=================================================

शनिवार, अगस्त 09, 2014

भाई-चारा संवाद

===============================================================
भूमिका :
ये एक आँखों देखा, कानों सुना संवाद है ... मैं कैसरबाग में एक मामूली से होटल में चाय पीने रुका था तो आगे की टेबल पर दो लोग बातें कर रहे थे ! उनकी आवाज साफ़ सुनाई दे रही थी, उधारी का मामला था ... ख़ास बात ये थी कि लेनदार रिरिया रहा था और देनदार गरज रहा था !  आप भी जरा भाई-चारा संवाद सुनिए -
===============================================================

-- भाई जी बहुत जरुरत थी रुपयों की
-- अबे तो ले लेना ,,, रुपये कहीं भागे जा रहे हैं

-- भाई जी आपने दस दिन के लिए रुपये लिए थे, छह महीने हो गए
-- तुम तो साले को बहुत चिरइन्धे आदमी हो, पैसा क्या लिया ,, तुमने तो ## में चरस बो दिया ,, हद्द है 

-- नहीं भाई जी ऐसी बात नहीं है, घर की छत पर एक कमरा बनवा रहे हैं, इसलिए बहुत सख्त जरुरत थी रुपयों की
-- अबे तो ठीक है न, परसों पेमेंट आने वाला है, ले लेना, अब साले तुम मेरे दिमाग का दही न करो .. चाय-समोसा मंगवाओ 

(2 चाय, 2 प्लेट समोसे का आर्डर देने के बाद)
-- भाई जी आप हमेशा ऐसे ही टाल देते हो, हर बार कल-परसों करते-करते छह महीने निकल गए
-- अबे भों## के तुमसे तो साला रुपया लेना गुनाह हो गया, पहले मालुम होता कि तुम इतने बड़े घिस्सू हो तो किसी दुसरे से रुपया ले लेते 

-- भाई जी आपने तीस हजार दस दिन के लिए कहे थे, साथ में ब्याज देने को भी बोला था, मुझे ब्याज नहीं चाहिए, आप आधा-आधा करके ही दे दो
-- कउनो टटपुन्जिया समझे हो का बे ? भों## के ऐसे हजारों रुपये मूत देता हूँ ... मेरा खुद लाखों रुपया फंसा हुआ है

-- भाई जी आप मेरी मज़बूरी समझो, आप अभी 5-10 हजार ही दे दो
-- अबे आदमी हो कि पैजामा ... कहा न पेमेंट आने वाला है, ले लेना
--------------------------------------------------------------------------------------
--------------------------------------------------------------------------------------
पता नहीं कब तक ये भाई-चारा संवाद चलता रहा !
मुझे देर हो रही थी ,,,,
मैंने चाय के पैसे दिए और लेनदार की ओर हमदर्दी भरी नजर डालकर निकल आया !
--------------------------------------------------------------------------------------
--------------------------------------------------------------------------------------
==============
The End 
==============
- फेसबुक लिंक -
https://www.facebook.com/prakash.govind/posts/842212069122426
=================================================

शुक्रवार, अगस्त 08, 2014

बोरिंग कथा ऑफ कम्बल


साल का अंत होने वाला था। बेइंतिहा सर्दी थी। इस सर्दी की वजह से एक आदमी नींद से उठकर दुकानों के बरामदे की सीढ़ियों पर बैठ गया। फिर वह चलने लगा, लेकिन इस तरह सर्दी और लगने लगी। वह दौड़ने लगा - पुराना नुस्खा था कि दौड़ने पर पसीना निकलता है। शहर के एक बड़े हिस्से में वह दौड़ता रहा। उसे पसीना आने लगा। सर्दी कम लगने लगी। लेकिन वह कब तक दौड़ता। वह थककर बैठ गया। धीरे-धीरे पसीने की वजह से सर्दी और तेज लगने लगी !
---
उसने देखा कि एक आदमी कम्बल ओढ़कर सो रहा है ! उसने उसका कम्बल खींचा और उसे लेकर भागने लगा ! जिसका कम्बल लेकर वह भागा था, वह उसके पीछे भागने लगा ! बीच-बीच में वह उसे गालियाँ भी दे रहा था ! जो कबल लेकर भाग रहा था, उसके हाथ से कम्बल गिर गया और एक नाले में चला गया !
---
अब दोनों एक दुसरे के सामने थे ! दोनों भिड गए और एक दुसरे को मारते रहे ! इस बीच एक तीसरा आदमी आ गया ! वह भी सर्दी की वजह से सो नहीं पा रहा था ! जब उसने देखा कि कम्बल नाले में गिरा है तो वह नाले में उतर गया ! इधर दोनों एक-दुसरे को ईंट-पत्थरों से मारते रहे, जिनमें एक पहले और दूसरा बाद में मर गया ! तीसरा गहरे नाले की कीचड में डूब गया !
---
सुबह न तो पुलिस और न अखबार वाले कम्बल के साथ इन तीनों की मौत का सबंध जोड़ पाए ! अलबत्ता और कोई कपडा आस-पास न होने की वजह से पुलिस ने तीनों के शवों को फिलहाल तो उस कम्बल पर लिटाया, जो नाले के बगल में पुलिस वालों को मिल गया था !
---
तीन दिन बाद एक कूड़ा बीनने वाला लड़का बहुत डरते-सहमते हुए थाने में यह पूछने आया कि जो कम्बल नाले के पास पुलिस वालों को मिला था, वह उसका था ! पुलिस ने उसको थाने में बैठा लिया और पूछ-ताछ शुरू हुयी कि वह उसे मिला कहाँ था ! पता ये लगा कि उसने वह कम्बल एक घर से चुराया था - किसी का कम्बल घर के सामने धुप में सूख रहा था, उसने उठा लिया और चलता बना ! पुलिस ने कूड़ा बीनने वाले लड़के को हवालात में बंद करके इतना मारा कि लड़का मर गया ! पुलिस ने अपनी जान बचाने के लिए रात में उस मरे हुए लड़के की लाश को फुटपाथ पर छोड़ दिया और उसे उसके कम्बल से ढक दिया
---
एक आदमी जो सर्दी से ठिठुर रहा था, उसने मरे हुए लड़के के शव के ऊपर से कम्बल उठाया और आगे निकल गया, फिर वह भागने लगा यह सोचकर कि कोई उसका पीछा कर रहा है ! भागते हुए वह रेल की पटरियां पार कर रहा था कि वह रेलगाड़ी की चपेट में आ गया और मर गया ! एक लड़का जो वहां कूड़ा बीना करता था, उसने वह कम्बल उठा लिया और यह देखते हुए कि कोई उसे देख तो नहीं रहा है, वह पटरियां पार करके घर आ गया !
---
माँ ने कम्बल देखकर बेटे से कहा - तुझे यह क्यों नहीं दिखा कि ये कम्बल उसके भाई का है, जो दो दिनों से लापता है ! माँ और बेटा अपने बेटे और भाई की तलाश में कम्बल लेकर निकल पड़े, यह सोचकर कि अगर वो मिल गया तो कम्बल ओढ़ाकर उसे घर ले आयेंगे ! मा-बेटे रात के बियाबान में खोजते रहे ....खोजते रहे ...
--
इस बीच पता नहीं कम्बल कब कहाँ कंधे से खिसककर गिर गया .....
---------------------------------------------------------------------- 
The End
---------------------------------------------------------------------- 
- फेसबुक लिंक - 
https://www.facebook.com/prakash.govind/posts/841672802509686
================================================

स्वर्ग, हैवन या ज़न्नत का फैसला कैसे होगा ?

मैं एक बात को लेकर बहुत कन्फ्यूज हूँ
---

---
मान लीजिये एक आदमी हिन्दू धर्म में पैदा हुआ ! जब 24-25 वर्ष का युवा हुआ तो क्रिस्चियन लड़की से प्यार कर बैठा, लेकिन लड़की ने शर्त रख दी कि पहले ईसाई धर्म अपनाओ तब शादी करुँगी ! लड़के ने धर्म परिवर्तन कर लिया ... बन गया क्रिस्चियन !
---
---
छह-सात वर्ष बीते उसके बाद डायवोर्स हो गया !

---
फिर एक लड़की पर दिल आया ,,, इस बार लड़की मुस्लिम थी ! मुस्लिम लड़की ने भी वही शर्त रख दी कि पहले इस्लाम अपनाओ ! लड़के ने एक बार
फिर धर्म परिवर्तन किया और बन गया मुसलमान !
---

---
कुछ साल बाद उसकी मौत हो जाती है
---

---
अब सवाल ये उठता है कि हिन्दू मान्यता के अनुसार तो मरने के बाद ऊपर भगवान् चित्रगुप्त जी कर्मों के हिसाब से पाप-पुण्य और स्वर्ग-नरक का फैसला करते हैं, लेकिन मरने वाले ने तो पहले ही हिन्दू धर्म से एकाउंट क्लोज कर लिया था .... ईसाई धर्म से भी एकाउंट क्लोज कर लिया था!
---
---
तो भैया ऊपर फैसला कैसे होगा ?
क्या अल्लाह मियां मरने वाले की फाईल जीसस और चित्रगुप्त से मंगवाएंगे ?
या फिर ऐसा तो नहीं कि
मरने वाला पहले स्वर्ग , उसके बाद हैवन और आखिर में ज़न्नत जाएगा ?

----------------------------------------------------------------------------
The End
---------------------------------------------------------------------------- 
- फेसबुक लिंक - 
https://www.facebook.com/prakash.govind/posts/840618519281781
================================================

बुधवार, जुलाई 30, 2014

लतेहड़पंती


शतरंजी लतेहड़पंती पर एक किस्सा याद आया .. 
आप भी सुनिए -
-----------------------------------------------------
पुरानी बात है
शोर-शराबे से दूर ,, खंडहर हो चुकी एक इमारत के बरामदे में मिर्ज़ा साहब रोजाना अपने दोस्त अनवर मियां के साथ शतरंज की बिसात जमाए रहते ! आज मिर्ज़ा साहब बहुत ताव खाए हुए थे ,,, लगातार दो बाजियों में करारी शिकस्त खाने के बाद तीसरी बाजी बिछी हुयी थी !
---
तभी मिर्ज़ा साहब का छोटा बेटा दौड़ता हुआ आया - 
"अब्बू घर चलिए अम्मी की तबियत खराब हो गयी है"
मिर्ज़ा साहब का दिमाग अपने ऊँट को बचाने में लगा हुआ था, बिसात पर नजरें गडाए हुए बोले - 
"जाकर जल्दी से हकीम साहब को बुला लाओ ... मैं आता हूँ"
---
थोड़ी देर बाद मिर्ज़ा साहब का मंझला बेटा भागता-हांफता हुआ आया - 
"अब्बू हकीम जी ने जवाब दे दिया, कह रहे हैं अब कोई दवा असर नहीं कर रही"
मिर्ज़ा साहब अगली चाल सोचते हुए बोले - 
"हम्म ,,,, ऐसा करो तुम सब अम्मी के पास ही रहो, देखभाल करो ... मैं आ रहा हूँ"  
अनवर मियां ने टोका - "मिर्ज़ा साहब जाईये घर हो आईये"
मिर्ज़ा साहब दो शिकस्त के बाद हिसाब बराबर करने पे उतारू थे, अनसुना कर बोले  - 
"आप घोड़े की शह बचिए"    
---
आधे घंटे बाद बड़ा बेटा बदहवास सा दौड़ता हुआ आया और ग़मगीन स्वर में बोला - 
"अम्मी का इंतकाल हो गया, अब्बू घर चलिए"
मिर्ज़ा साहब तीसरी बाजी भी हारने के बाद तिलमिलाए हुए थे ,,, 
बिसात पर जल्दी-जल्दी मोहरे सजाते हुए बोले - 
"मैं तुरंत पहुँच रहा हूँ ,,, तुम ऐसा करो तब तक मस्जिद से मौलवी साहब को बुला लो,,,, आकर दुआ पढ़ें"
---
---
चौथी बाजी में मिर्ज़ा एक-एक चाल संभल-संभल के चल रहे थे, अनवर मियां के दो प्यादे मारने के बाद बहुत उत्साहित थे और अब वजीर को घेरने के लिए चाल सोचने में लगे थे ,,, तभी बड़ा बेटा फिर भागता हुआ आया -
"अब्बू ज़नाज़े की रुखसती का वक़्त आ गया ,,, जल्दी घर चलिए"
मिर्ज़ा साहब शतरंज की बिसात पर हाथी को किनारे खींचते हुए बोले - 
"अनवर मियां अपना वजीर बचाईये" ,,,, 
फिर बड़े बेटे से मुखातिब हुए - "ज़नाज़ा जाएगा तो इसी रास्ते से न .... तुम लोग ज़नाजा उठाओ, मैं यहीं से शामिल हो जाऊँगा"
---
---
---
मिर्ज़ा साहब और अनवर मियां शतरंज की बिसात पर सिर झुकाए इस कदर दांव-पेंच में खोये रहे कि कब ज़नाज़ा सड़क से निकल गया, उन्हें खबर ही न हुयी ! 

-------------------------------------------------------------------------
-------------------------------------------------------------------------

बुधवार, जुलाई 02, 2014

जिन्होंने जन्म दिया

75 साल की उस बुढ़िया माँ का वजन लगभग 40 किलो होगा !
आज जब तबियत बिगड़ने पर वो डॉक्टर को दिखाने गयी ! 


डॉक्टर ने कहा ' माताजी आप हेल्थ का ख्याल रखिये ! आप का वजन जरूरत से ज्यादा कम है !! आप खाने में जूस, सलाद, दूध, फल, घी, हेल्थी फ़ूड लिजियें ! नहीं तो आपकी सेहत दिनों दिन गिरती जायेगी और हालत नाजुक हो जायेंगी ! '

उसने भारी मन से डॉक्टर की बात को सुना और बाहर निकल कर सोचने लगी, इतनी महंगाई में ये सब कहाँ से आएगा..? और पिछले पचास सालों में, फ्रूट, घी , मेवा घर में लाया कौन है..?

बहुत ही मामूली पेंसन से जो थोडा बहुत पैसा मिलता है उससे घर के जरुरी सामान तो पति ले आतें है, लेकिन फल, जूस, हरी सब्जी, ये सब पति ने कभी ला कर नहीं दिया, ....और खुद भी कभी ये सब खरीदने की हिम्मत नहीं कर सकी....क्यूंकि जब भी मन करता कुछ खाने का, खाली पर्स हमेशा मुंह चिढाने लगता....

नागपुर (विदर्भ) जैसे शहर में ... मामूली सी नौकरी में और जिंदगी की गहमागहमी में सारी जमा पूंजी, पति का PF, घर की सारी अमानत, संपदा, गहने जेवर सब एक बेटे और दो बेटियों की परवरिश, पढाई लिखाई शादी में में सब कुछ खत्म हो गया...

दूर दिल्ली में रह रहा एक बहुत बड़ी कंपनी में मैनेजर और मोटी तनख्वाह उठा रहा बेटा भी तो खर्चे के नाम पर सिर्फ पांच सौ रुपये देता है...वो भी महीने के..... बेटियों से अपने दुःख माँ ने सदा छुपाये है...उन्हें कभी अपने गमो में शामिल नहीं किया...आखिर ससुराल वाले क्या सोचेंगे.....???

अब बेटे के भेजे इन पांच सौं रुपये में बूढ़े माँ बाप तन ढके या मन की करें ?????

उसने सोचा चलो एक बार बेटे को डॉक्टर की रिपोर्ट बता दी जाए.. उसने बेटे को फ़ोन किया और कहा - बेटा डॉक्टर ने बताया है की विटामिन, खून की की कमी, कमजोरी से से चक्कर आये थे .... इसी लिए खाने में सलाद, जूस, फ्रूट, दूध, फल , घी , मेवा लेना शुरू करो !!

बेटा - "माँ आप को जो खाना है खाओ , डॉक्टर की बात ना मानों.... !!"

माँ ने कहा – बेटा, थोड़े पैसे अगर भेज देता तो ठीक रहता..... !!

बेटा - " माँ इस माह मेरा बहुत खर्चा हो रहा है, कल ही तेरी पोती को मैंने फिटनेस जिम जोईन कराया है, तुझे तो पता ही है, वो कितनी मोटी हो रही है, इसी लिए जिम ज्वॉइन कराया है... ...उसके महीने के सात हजार रुपये लगेंगे...जिसमे उसका वजन चार किलो हर माह कम कराया जाएगा..... और कम से कम पांच माह तो उसे भेजना ही होगा.......पैंतीस हजार का ये खर्चा बैठे बिठाये आ गया....अब जरुरी भी तो है ये खर्चा...!! आखिर दो तीन साल में इसकी शादी करनी है और आज कल मोटी लड़कियां, पसंद कोई करता नहीं.....!! "

माँ ने कहा - " हाँ बेटा ये तो जरुरी था.....कोई बात नहीं वैसे भी डॉक्टर लोग तो ऐसे ही कुछ भी कहतें रहते है.....चक्कर तो गर्मी की वजह से आ गयें होंगे, वरना इतने सालों में तो कभी ऐसा नहीं हुआ ..... खाना तो हमेशा से यही खा रही हूँ मैं...!!!"

बेटा - "हाँ माँ.....अच्छा माँ अभी मैं फोन रखता हूँ ....बेटी के लिए डाइट चार्ट ले जाना है और कुछ जूस, फ्रूट और डायट फ़ूड भी ....आप अपना ख्याल रखना !!"

फोन कट गया....माँ ने एक ग्लास पानी पिया...और साडी पर फॉल लगाने मे लग गयी .... साड़ी में फॉल लगाने के माँ को पन्द्रह रुपये मिलेंगे....इन रुपयों से माँ आज गणेश पूजा के लिए बाजार से लड्डू खरीदेंगी....आज गणेश चतुर्थी जो है !!
-------------------------------------------------------------------------------------------------------

मंगलवार, जुलाई 01, 2014

राजवैद्य की जादुई पुडिया

एक राजवैद्य थे, सिर्फ राज-परिवार से सम्बंधित लोगों का ही उपचार करते थे ! समय बीता,,,, राजा-जमीदार कहने भर को रह गए ! ठाठ-बाट में पल रहे राजवैद्य जी को महसूस हुआ कि अब एक खूंटे से बंधे रहकर कुछ नहीं हो सकता !

राजवैद्य जी ने आगामी योजना सोच ली ! 


उनके तमाम चेले-चपाटों ने नगर भर में बैनर-पोस्टर टांग दिए ! गाड़ियों से घूम-घूमकर एनाउंस करवा दिया गया कि नगरवासियों के हर तरह का रोग दूर करने के लिए राजवैद्य जी ने फैसला किया है ! बारह वर्षों तक राजपरिवार में जादू दिखाने वाला जादूगर अब नगरवासियों की सेवा करेगा !


निश्चित तारीख को राजवैद्य पधारे ! पूरा नगर उमड़ पड़ा ,,, ऐसा लगा मानो जनसैलाब बह रहा हो ! राजवैद्य और उनके चेले सभी रोगियों को पांच सौ रुपये की एक खुराक पुडिया दे रहे थे, लोग अपनी जरुरत और हैसियत के मुताबिक़ पुडिया ले रहे थे ,,कोई दो, कोई चार ,,,, कोई दस ! दवा महंगी जरुर थी लेकिन सबको रोग मुक्त होना था तो दिल पे पत्थर रख के दवा ले रहे थे ! सभी रोगियों को एक बात कायदे से समझा दी गयी थी कि दवा किस विधि से खानी है ये बात राजवैद्य जी शिविर समापन पर बताएँगे !
---
---
खैर तीन दिन तक सुबह से रात तक जमकर दवा वितरण का कार्यक्रम चला !


जब लगभग सारे रोगी निपट गए तो राजवैद्य बाहर आये और जनता को संबोधित किया : 


"बहुत प्रसन्नता की बात है कि आप सब ने मिलकर इस रोगमुक्त शिविर कार्यक्रम को सफल बनाया ! मेरे लिए ये मिटटी मेरी माँ है, इसकी सेवा करना ही मेरा कर्तव्य है ! मेरा अब दुसरे नगर के प्रस्थान का समय हो गया है ,,, जाते-जाते आपको दी गयी औषधि के विषय में बता दूँ ,,, ये दवा काफी कडवी है लेकिन रोगमुक्त होने के लिए इतना तो आपको सहन करना ही होगा ! एक और विशेष बात इस दवा को प्रातः चार बजे खाली पेट "स्वर्ण भस्म" के साथ खाना है ! अब हमें आज्ञा दीजिये ,,, नमस्कार !;
---
राजवैद्य जी की घोडा गाड़ी तैयार खडी थी ,,, चेलों को लेकर उड़ गए !
जनता अभी भी मुंह बाए ताक रही थी !
=============================================

डिस्क्लेमर : 
------------
इस कथा का सम्बन्ध किसी भी घटना अथवा व्यक्ति से नहीं है , अगर किसी को ऐसा आभास होता है तो वो बाबा रामदेव के शिविर में जाकर अपना इलाज कराये !

रविवार, अप्रैल 20, 2014

एक रहेन मिश्रीलाल : चुनावी चकल्लस

पहले की बात है ! लखीमपुर में एक ठो रहे मिश्रीलाल ! विधायकी के चुनाव के लिए दुई-चार चेले-चपाटों ने उकसा दिया तो मिश्रीलाल भी खड़े हो गए ! जीतना भला किसे था लेकिन ठसक बनी रहे, ये भी जरुरी था !

खैर, बैलेट बॉक्स खुलने का दिन भी आया,
पता चला मिश्रीलाल को टोटल 74 वोट मिले हैं !

अगले रोज जब रोज की तरह दो-चार चेले-चपाटों के साथ टहलने निकले तो जिधर जाएँ, वहीँ से आवाज़ आये - "दद्दा आपै का भोट दिए रहेन !" मिश्रीलाल यही बात सुनत-सुनत अघाय गए, माइंड फ्रेश करने के लिए सिगरेट पीने दूकान पे गए तो पनवाड़ी भी चहक उठा - "दद्दा हमहू आपै का भोट दिया रहा"

इतना सुनना था कि तपे हुए मिश्रीलाल बमक पड़े - "भूतनी के कउनो सिर्री-विर्री समझे हो का ? 80-82 भोट तो हमरे घरे-बिरादरी केरे हैं ,, ओहू पूरै न मिले ,, वोहू मा पनौती ,,, यहाँ सरऊ जिहका देखौ कहि रहा है - हमउ दियै,, हमउ दिये,, अतने भोट कहाँ घुसि गए ?"

मिश्रीलाल का बमकना आगे भी जारी रहा -
",,,, खडन्जा बिछवाएन खातिर रात-दिन किहेन हम, नहरिया से पानी काटै बदि के कुलाबा लगवायेन हम, कउनो काम हो तो दद्दा दद्दा ,,, अऊर जब चुनाव आवा तो आपन-आपन जाति-बिरादरी माँ भोट खोंस दिहिन ,,, आवौ अब कौनो काम खातिर बताएब हमहूँ ,,,,,"

दद्दा का मूड गरम देख चेले-चपाटे दायें-बाएं खिसक लिए !


===========
End
===========
फेसबुक लिंक : 
https://www.facebook.com/photo.php?fbid=779886105355023&l=af6e17c81d 
-------------------------------------------------------------------------------------------------

सोमवार, फ़रवरी 10, 2014

एक दिलचस्प और सच्चा किस्सा


मूक सिनेमा के दौर का यह एकदम सच्चा वाकया है ! मशहूर निर्देशक होमी मास्टर और उनकी फ़िल्म के हीरो के बीच किसी बात को लेकर विवाद हो गया ! झगड़ा इतना ज्यादा बढ़ गया कि बीच-बचाव की नौबत आ गयी ! क्रोध में हीरो ने होमी मास्टर के साथ काम न करने का एलान कर दिया और शूटिंग छोड़कर चल दिया ! 

सेट पर सन्नाटा छा गया कि अब क्या होगा ? होमी मास्टर भी हार मानने को तैयार नहीं थे ! थोड़ी देर सोचते रहे, उसके बाद फरमाया कि एक कुत्ते को शूटिंग के लिए लाया जाए ! उन्होंने बैठे-बैठे फ़िल्म की स्टोरी स्क्रिप्ट में फेर-बदल कर डाला - अब एक नया दृश्य जोड़ा गया, जिसमें एक जादूगर अपने जादू की ताकत से हीरो को कुत्ता बना देता है ! 

कुत्ता लाया गया ! शूटिंग शुरू हुयी ! अब बेचारी हिरोइन के लिए हीरो की जगह कुत्ता था, जिसे वह प्रेमी की तरह गले लगाती और प्यार करती ! इधर शूटिंग चलती रही और चटखारेदार ख़बरें बनती रहीं और उधर बेचारा हीरो अपनी जगह कुत्ते को लिए जाने की खबर से इतना अधिक विचलित हो गया कि उसने सुलह-सफाई कर ली ! 

हीरो शूटिंग पर लौट आया ! होमी मास्टर ने एक नया दृश्य तैयार किया, जिसमें जादूगर कुत्ते को वापस उसके असली रूप में ले आता है और हिरोईन से उसका मिलन हो जाता है ! फ़िल्म की रिलीज पर इस कुत्ते वाले 'सीक्वेंस' को पब्लिक से जबर्दस्त तालियां और दाद मिली ! 

अब बताईये क्या कहा जाए ? 
हिंदुस्तान की पब्लिक का कोई जवाब नहीं  :-)

मुझे लगता रहता है कि होमी मास्टर आज भी ज़िंदा है ! वो फ़िल्म से टीवी में भले ही कई रूपों में आ गया हो, उसका नाम भले ही एकता कपूर या कुछ और हो गया हो ! मगर मुझे लगता है कि होमी मास्टर आज भी ज़िंदा है ! है कि नहीं जी ?
=======================
The End 
=======================