 उस बस्ती से बाहर जाने वाले रास्ते पर एक विशाल पत्थर पड़ा था ! बस्ती वालों ने कई बार सरकारी संस्थाओं से गुहार की थी कि उस पत्थर को हटा दिया जाए क्यूंकि उससे आम जनता को बड़ी परेशानी होती है , लेकिन जैसा कि सरकारी काम काज में हमेशा होता है , उनकी बात पर किसी ने ध्यान नही दिया !
लेकिन एक बार संयोग से जब राज्य में सरकार बदली तो एक ऐसे सज्जन मुख्यमंत्री बन गए , जिनके एक रिश्तेदार उस बस्ती में रहते थे ! रिश्तेदार ने मुख्यमंत्री से कहा ! मुख्यमंत्री ने तुंरत कार्यवाई करने का आश्वासन दिया ! मुख्यमंत्री ने एक मंत्री को "पत्थर हटाओ विभाग" का मंत्री बना दिया ! मुख्यमंत्री के पास , जाहिर है कि बहुत सारे काम थे , सो व्यस्तता के चलते वे "पत्थर हटाओ विभाग" बनाना भूल गए ! नए बने मंत्री सचिवालय गए और उन्होंने जगह-जगह पूछा कि "पत्थर हटाओ विभाग" कहाँ है ? लेकिन उन्हें कोई ठीक जवाब नही दे पाया ! यहाँ तक कि अपने विभाग की खोज में वे सचिवालय के बाहर पानवालों और चायवालों के पास भी गए , लेकिन उन्हें कुछ पता नही चला ! उन्हें कार, बंगला, सुरक्षा गार्ड और चपरासी मिल गए, लेकिन विभाग नही मिला !
कालांतर में राजनैतिक वजहों से अचानक मंत्री जी का राजनैतिक वजन बढ़ गया सो मुख्यमंत्री को उनकी बात सुननी पडी ! तुंरत विभाग का गठन हो गया ! "पत्थर हटाओ विभाग" में एक सचिव, एक संयुक्त सचिव, एक उप सचिव आदि मय पीए, टाइपिस्टों, चपरासियों के आ गए ! बल्कि एक पत्थर हटाओ निदेशालय भी बन गया और वहां निदेशक, उप निदेशक आदि मय अमले के आ गए ! हर विभाग का बजट बना ! बैठकें होने लगीं ! अच्छा खासा दफ्तर बन भी गया !
लेकिन एक समस्या हो गई ! जिस बैठक में पत्थर हटाने के लिए मजदूर लगाने का निर्णय होना था उसके पहले मंत्रिमंडल में फेरबदल हो गया ! विभाग के मंत्रीजी को वित्त विभाग में छुट्टे पैसों का स्वतंत्र प्रभार मिल गया और पशुपालन विभाग में सुअरबाड़े के प्रभारी मंत्री "पत्थर हटाओ विभाग" के मंत्री हो गए ! उनकी इस विभाग में कोई रूचि नही थी ! सचिव महोदय भी तबादला करवा कर दिल्ली चले गए ! उसके बाद कालांतर में सरकार बदल गई और नए मुख्यमंत्री की भी इस विभाग में कोई रूचि नही थी, इसलिए पत्थर वहीँ पड़ा रहा ! फ़िर निजीकरण की क्रान्ति आ गई, जहाँ तहां ढीले-ढाले सरकारी तंत्र की जगह चुस्त दुरुस्त निजी क्षेत्र आ गए !
फ़िर वक्त के फेर में पुराने वाले मुख्यमंत्री फ़िर से मुख्यमंत्री बन गए ! उनके रिश्तेदार पत्थर की शिकायत लेकर फ़िर उनसे मिले ! मुख्यमंत्री ने कहा कि अबकी बार वे सरकारी तंत्र पर निर्भर नही रहेंगे ! यह काम निजी क्षेत्र को दिया जायेगा !
"पत्थर हटाओ विभाग" को ख़त्म करके उसका विनिवेश कर दिया गया ! एक निजी कंपनी को पत्थर हटाने का ठेका मिला ! उस कंपनी ने एक और कंपनी बनायी, जिसका नाम 'स्टोन एंड स्टोन' था ! एक विख्यात मेनेजर को इस कंपनी का जनरल मेनेजर बनाया गया ! इसके बाद कई मेनेजर नियुक्त हुए ! एक सज्जन मानव संसाधन मेनेजर बने, एक प्रोडक्शन मेनेजर बने, एक जनसंपर्क मेनेजर बने, एक मेंटेनेंस विभाग के मेनेजर बने, जाहिर है एकाउंट्स और सामान्य काम काज देखने के लिए मेनेजर तो थे ही ! एक शानदार एयर कंडीशंड खूबसूरत ऑफिस बनाया गया ! तमाम अखबारों में विज्ञापन दिए गए !
ऑफिस में तमाम भर्तियाँ हुयीं ! इस बीच जनरल मेनेजर ने इस्तीफा दे दिया ! उन्हें मनाने के लिए उन्हें तरक्की देकर सीईओ और प्रेसिडेंट बना दिया गया ! इसी बीच और मेनेजरों कि तरक्की भी हुयी, जो मेनेजरों थे वे सब जनरल मैनेजेर हो गए ! जनरल मैनेजेर वाइस प्रेसिडेंट हो गए, बाबू मेनेजर हो गए ! इन लोगों की रोज कई बैठकें होतीं थीं ! जिनमे तय किया गया कि पत्थर हटाने के लिए कुछ मजदूरों को भर्ती किया जाए !
मजदूर भर्ती भी हुए, लेकिन इस बीच कंपनी की आर्थिक स्थिति ख़राब हो गई और उसे ठीक करने के लिए मजदूरों को निकालने का फ़ैसला किया गया ! यह पाया गया कि मजदूर कंपनी पर बोझ थे, इसलिए उनकी छुट्टी कर दी गई ! लेकिन पत्थर हटाने का काम करना जरूरी था इसलिए यह तय किया गया कि किसी और कंपनी को पत्थर हटाने का ठेका दिया जाए ! यह प्रक्रिया चल ही रही थी कि मालिक ने घोषणा कर दी कि कंपनी घाटे में है और इसे बंद किया जाए ! मेनेजर लोग दूसरी कंपनी में चले गए, कंप्यूटर बेच दिए गए !
वह पत्थर अब भी बस्ती के रास्ते में पड़ा है !!! |
11 प्रतिक्रियाएं:
बहुत बढिया आलेख लिखा है।बधाई स्वीकारें।
वाह भाई मजा आ गया ! क्या खूब तस्वीर खीची है आपने लोकतंत्र की ! आपके व्यंग लेखन की जितनी भी तारीफ़ की जाए कम है ! सरकारी योजनाओं का यही हाल होता है ! कमाल का लिखा है ! मेरी हार्दिक शुभकामनाएं स्वीकार करें ! अगले ब्लॉग का इन्तजार रहेगा !
- शिव मोहन बरनवाल
झांसी
बहुत खूब ,
आपने तो लोकतंत्र की बखिया ही उधेड़ दी वो भी बेहद करीने से,
ऐसा करारा व्यंग पढने में आनंद आ गया,
इसकी एक-एक कॉपी विधानसभा और संसद में भी बांटनी चाहिए,
सरकार की सभी योजनाओं का कमोबेश यही हाल है,
आपके व्यंग लेखन को मेरा सलाम,
लिखना जारी रखिये,
मेरी बधाई
- कमल दास अरोड़ा
वाराणसी
waaaaaaah
bahut khoooooooob
bahut sundar rachna hai
loktantra ki asli tasweer dikha dee aapne.
- jyoti patel
वाआआआह ,
ये हुयी न बात ...........
मजा आ गया पढने में ,
भइया मेरे मोहल्ले का भी कुछ ऐसा ही हाल है,
ज्ञानेंद्र मोहन
आनंद नगर
लखनऊ
वाह गोविन्द भाई वाह !
लोकतंत्र की नौटंकी पढ़कर मजा आ गया , चारों तरफ़ लोकशाही का यही नजारा देखने को मिलता है , बस मीटिंग बाज़ी ही होती रहती है , लेकिन एक बात है अगर उस क्षेत्र का दौरा किसी वीआईपी ने किया होता तो रातों रात पत्थर हट जाता या कोई बड़ी दुर्घटना हो गई होती और मीडिया पहुँच जाता तो भी पत्थर तुंरत हट जाता !
अगले ब्लॉग का इन्तजार है
हमारी शुभकामनाएं
- के एन सिसोदिया
बुलंदशहर
bahut badhiya.
sarkaari kaam-kaaj ka badhiya seen prastut kiya hai aapne.
desh ko aajaad huye 61 saal ho gaye lekin laal feeta shaahi jyon ki tyun hai.
Pratibha Katyal
(Gurgaon)
प्रकाश भाई अब देश ऐसी ही कार्यप्रणाली का आदी हो गया है ! जो भी इस सिस्टम को सुधारने की कोशिश करना चाहता है सब उसकी टांग खींचने लगते हैं ! अच्छा लिखा है आपने, पढने में मजा आया ! आगे भी आपके ब्लाग्स पढता रहूँगा !
शोभित राय - (चंडीगढ़)
करार व्यंग है इस लोकतंत्र पर !
लेखन के लिए शुभकामनाएं !
भूपेन्द्र सहाय
नागपुर
बहुत बढ़िया.
lol,so nice