रविवार, जून 19, 2016

गुरु और चेला :-)


घने जंगल से गुजरती हुई सड़क के किनारे एक ज्ञानी गुरु अपने चेले के साथ एक बोर्ड लगाकर बैठे हुए थे, जिस पर लिखा था :- 
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"ठहरिये... आपका अंत निकट है। इससे पहले कि बहुत देर हो जाये, रुकिए ! हम आपका जीवन बचा सकते हैं।" -- 
-- 
एक कार फर्राटा भरते हुए वहाँ से गुजरी। चेले ने ड्राईवर को बोर्ड पढ़ने के लिए इशारा किया। ड्राईवर ने बोर्ड की तरफ देखा और भद्दी सी गाली दी और चेले से यह कहता हुआ निकल गया :- 
.
 "तुम लोग इस बियाबान जंगल में भी धंधा कर रहे हो, शर्म आनी चाहिए।" 
-- 
चेले ने असहाय नज़रों से गुरूजी की ओर देखा। गुरूजी बोले, "जैसे प्रभु की इच्छा।" 
-- 
कुछ ही पल बाद कार के ब्रेकों के चीखने की आवाज आई और एक जोरदार धमाका हुआ। 
-- 
कुछ देर बाद एक मिनी-ट्रक निकला। उसका ड्राईवर भी चेले को दुत्कारते हुए बिना रुके आगे चला गया। 
-- 
कुछ ही पल बाद फिर ब्रेकों के चीखने की आवाज़ और फिर धड़ाम। 
-- 
गुरूजी फिर बोले - "जैसी प्रभु की इच्छा।" 
-- 
-- 
अब चेले से रहा नहीं गया और वह बोला, "गुरूजी, प्रभु की इच्छा तो ठीक है पर कैसा रहे यदि हम इस बोर्ड पर सीधे-सीधे लिख दें कि - "आगे पुलिया टूटी हुई है" 


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शनिवार, जून 18, 2016

बेहतरीन थ्री डी चित्रकारी


वाह ... गज़ब का कलाकार 
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शुक्रवार, जून 17, 2016

जो भी है, बस यही एक पल है


जिस पल आपकी मृत्यु हो जाती है, 
उसी पल से आपकी पहचान एक "बॉडी" बन जाती है। 
अरे~~ "बॉडी" लेकर आइये,,, "बॉडी" को उठाइये, 
ऐसे शब्दो से आपको पूकारा जाता है, वे लोग भी आपको आपके नाम से नही पुकारते, 
जिन्हे प्रभावित करने के लिये आपने अपनी पूरी जिंदगी खर्च कर दी। 
जीवन में आने वाली हर चूनौती को स्वीकार करें अपनी पसंद की चीजों के लिये खर्चा कीजिये .. इतना हंसिये कि पेट दर्द हो जाये .. बिलकुल छोटे बच्चे बन जाइये 
क्योंकि मृत्यु जिंदगी का सबसे बड़ा लॉस नहीं है। 
लॉस तो वो है कि जिंदा होकर भी आपके अंदर जिंदगी जीने की आस खत्म हो चुकी है। 
हर पल को खूशी से जीने को ही जिंदगी कहते है। 
जिंदगी है छोटी, पर हर पल में खुश हूँ .. 
काम में खुश हूं .. आराम में खुश हूँ , 
"आज गाड़ी नहीं", पैदल ही खुश हूं, 
"दोस्तों का साथ नहीं", अकेला ही खुश हूं, 
"आज कोई नाराज है", उसके इस अंदाज से ही खुश हूं, 
"जिस को देख नहीं सकता", उसकी आवाज से ही खुश हूं, 
"जिसको पा नहीं सकता", उसको सोच कर ही खुश हूं, 
"बीता हुआ कल जा चुका है" , उसकी मीठी याद में ही खुश हूं, 
"आने वाले कल का पता नहीं" , इंतजार में ही खुश हूं, 
"हंसता हुआ बीत रहा है पल" .. आज में ही खुश हूं, 
"जिंदगी है छोटी", हर पल में खुश हूं, . . 

--- Be Happy Always --- 


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ये तो रियल हीरो है ...


बेंगलुरु के विनीत विजियन ने एमबीबीएस स्टूडेंट की स्टोरी शेयर की है।

विनीत विजयन नाम के शख्स ने फेसबुक पर लिखा है : - 'मैं बेंगलुरु मेडिकल कॉलेज के लिए ऑटो का इंतजार कर रहा था। दरअसल, वहां मेरे दोस्त की मां भर्ती थीं, जिन्हें मैं देखने जा रहा था। तभी एक ऑटो रुका। 
.
मैंने आॅटो ड्राइवर से कहा- पीठ में दर्द है, आराम से चलना। उसने जवाब दिया, ठीक है सर। अमूमन ऐसा जवाब बेंगलुरु में आॅटो चालकों से सुनने को नहीं मिलता है। कुछ देर में ही मेडिकल कॉलेज पहुंच गया। 
मैंने उससे पूछा कि कितना किराया हुआ। वह सीट के पास लगे बॉक्स की ओर इशारा कर बोला, जो इच्छा हो सर, इसमें डाल दीजिए। 
कुछ देर तक तो मैं सोचता रहा, फिर डिब्बे को गौर से देखा तो उसके ऊपर लिखा था, गरीबों और जरूरतमंदों के लिए डोनेशन कीजिए। इस बीच देखा कि जो सिक्युरिटी गार्ड मेन गेट पर किसी की गाड़ी तक खड़ी नहीं होने देता। वो ड्राइवर को देखकर मुस्कुरा रहा है। फिर उससे बोलता है... नमस्कार सर। मुझे लगा शायद सिक्युरिटी गार्ड ड्राइवर के बारे में ज्यादा जानता है।'' 
मैंने कुछ पैसे डोनेशन बॉक्स में डाले और ड्राइवर ऑटो लेकर चला गया। मैंने गार्ड से उसके बारे में पूछा। पता चला कि आटो ड्राइवर लड़के के चार भाई-बहन हैं। पिता की मौत हो चुकी है, बड़ा भाई पैरालाइज्ड है और दो छोटी बहनें हैं। पिछले साल अच्छे मार्क्स से पास होने पर कॉलेज सुप्रिटेंडेंट ने उसे ऑटो गिफ्ट किया था। 
पहले महीने ही उसने ऑटो चलाकर कुछ पैसे बचा लिए और सुप्रिंटेंडेंट को देने चाहे पर उन्होंने इंकार कर दिया। इसके बाद से उसने मेडिकल कॉलेज आने वाले सभी पैसेंजरों को फ्री लाना शुरू कर दिया या कुछ पैसे बॉक्स में डालने को कहता है। महीने के आखिर में बचाए हुए पैसे मेडिकल कॉलेज में इलाज कराने आए जरूरतमंदों पर खर्च करता है। 
मैं यह सब सुनकर चकित था...ये तो शहर का रियल हीरो है...भगवान उसकी मदद करे। 

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गुरुवार, जून 16, 2016

बिना किसी गाइडेंस, बिना किसी कोचिंग के बनी आई.ए.एस


3 मई की तारीख को रोज की तरह वंदना अपने घर में अपने पिताजी के ऑफिस में गई और आदतन सबसे पहले यूपीएससी की वेबसाइट खोली। वंदना को दूर-दूर तक अंदेशा नहीं था कि आज आईएएस का रिजल्ट आने वाला है, लेकिन इस सरप्राइज से कहीं ज्यादा बड़ा सरप्राइज अभी उसका इंतजार कर रहा था। टॉपर्स की लिस्ट देखते हुए अचानक आठवें नंबर पर उसकी नजर रुक गई। आठवीं रैंक. नाम- वंदना. रोल नंबर-029178. बार-बार नाम और रोल नंबर मिलाती और खुद को यह यकीन दिलाने की कोशिश करती कि यह मैं ही हूं... हां, वह वंदना ही थी। 
वंदना की आंखों में इंटरव्यू का दिन घूम गया। दुबली-पतली सी लड़की यूपीएससी की बिल्डिंग में इंटरव्यू के लिए पहुंची। शुरू में थोड़ा डर लगा था, लेकिन फिर आधे घंटे तक चले इंटरव्यू में हर सवाल का आत्मविश्वास और हिम्मत से सामना किया। बाहर निकलते हुए वंदना खुश थी, लेकिन उस दिन भी घर लौटकर उसने आराम नहीं किया। किताबें उठाईं और अगली आइएएस परीक्षा की तैयारी में जुट गईं। 
यह रिजल्ट वंदना के लिए तो आश्चर्य ही था। यह पहली कोशिश थी। कोई कोचिंग नहीं, कोई गाइडेंस नहीं. कोई पढ़ाने, समझने, बताने वाला नहीं। आइएएस की तैयारी कर रहा कोई दोस्त भी नहीं। यहां तक कि वंदना कभी एक किताब खरीदने भी अपने घर से बाहर नहीं गईं। एक साल तक अपने कमरे में बंद होकर सिर्फ और सिर्फ पढ़ती रहीं।’’ 
वंदना का जन्म हरियाणा के नसरुल्लागढ़ गांव के एक बेहद पारंपरिक परिवार में हुआ। उनके घर में लड़कियों को पढ़ाने का चलन नहीं था। उनकी पहली पीढ़ी की कोई लड़की स्कूल नहीं गई थी। वंदना की शुरुआती पढ़ाई भी गांव के सरकारी स्कूल में हुई। वंदना के पिता महिपाल सिंह चौहान कहते हैं- ‘‘गांव में स्कूल अच्छा नहीं था, इसलिए अपने बड़े लड़के को मैंने पढऩे के लिए बाहर भेजा। बस, उस दिन के बाद से वंदना की भी एक ही रट थी - मुझे कब भेजोगे पढऩे ?’’ 
महिपाल सिंह बताते हैं कि शुरू में तो मुझे भी यही लगता था कि लड़की है, इसे ज्यादा पढ़ाने की क्या जरूरत. लेकिन मेधावी बिटिया की लगन और पढ़ाई के जज्बे ने उन्हें मजबूर कर दिया। वंदना ने एक दिन अपने पिता से गुस्से में कहा, ‘‘मैं लड़की हूं, इसीलिए मुझे पढऩे नहीं भेज रहे।’’ महिपाल सिंह कहते हैं, ‘‘बस, यही बात मेरे कलेजे में चुभ गई. मैंने सोच लिया कि मैं बिटिया को पढ़ने बाहर भेजूंगा।’’ 
छठी क्लास के बाद वंदना मुरादाबाद के पास लड़कियों के एक गुरुकुल में पढऩे चली गई। वहां बहुत ही कड़े अनुशासन में रहना पड़ता, खुद ही अपने कपड़े धोना, कमरे की सफाई करना और यहां तक कि महीने में दो बार खाना बनाने में भी मदद करनी पड़ती थी। हरियाणा के एक पिछड़े गांव से बेटी को बाहर पढऩे भेजने का फैसला महिपाल सिंह के लिए भी आसान नहीं था। वंदना के दादा, ताया, चाचा और परिवार के तमाम पुरुष इस फैसले के खिलाफ थे। वे कहते हैं- ‘‘मैंने सबका गुस्सा झेला, सबकी नजरों में बुरा बना, लेकिन अपना फैसला नहीं बदला।’’ 
10वीं के बाद ही वंदना की मंजिल तय हो चुकी थी। वो कॉम्प्टीटिव मैग्जीन में टॉपर्स के इंटरव्यू पढ़तीं और उसकी कटिंग अपने पास रखतीं। किताबों की लिस्ट बनातीं, कभी भाई से कहकर तो कभी ऑनलाइन किताबें मंगवाती। बारहवीं तक गुरुकुल में पढ़ने के बाद वंदना ने घर पर रहकर ही लॉ की पढ़ाई की। कभी कॉलेज नहीं गई। परीक्षा देने के लिए भी पिताजी साथ लेकर जाते थे। 
गुरुकुल में सीखा हुआ अनुशासन एक साल तैयारी के दौरान काम आया। रोज तकरीबन 12-14 घंटे पढ़ाई करती. नींद आने लगती तो चलते-चलते पढ़ती थी. वंदना की मां मिथिलेश कहती हैं - ‘‘पूरी गर्मियां वंदना ने अपने कमरे में कूलर नहीं लगाने दिया, कहती थी, ठंडक और आराम में नींद आती है.’’ वंदना गर्मी और पसीने में ही पढ़ती रहती ताकि नींद न आए। 
वंदना ने बाहर की दुनिया कभी देखी ही नहीं। कभी हरियाणा के बाहर कदम नहीं रखा, कभी सिनेमा हॉल में कोई फिल्म नहीं देखी, कभी किसी पार्क और रेस्तरां में खाना नहीं खाया, कभी दोस्तों के साथ पार्टी नहीं की, कभी कोई बॉयफ्रेंड नहीं रहा, कभी मनपसंद जींस-सैंडल की शॉपिंग नहीं की। अब जब मंजिल मिल गई है तो वंदना अपनी सारी इच्छाएं पूरी करना चाहती है, घुड़सवारी करना चाहती है और निशानेबाजी सीखना चाहती है. खूब घूमने की इच्छा है।
आज गांव के वही सारे लोग, जो कभी लड़की को पढ़ता देख मुंह बिचकाया करते थे। वंदना की सफलता पर गर्व से कह रहे हैं- ‘‘लड़कियों को जरूर पढ़ाना चाहिए। बिटिया पढ़ेगी तो नाम रौशन करेगी।’’ यह कहते हुए महिपाल सिंह की आंखें भर आती हैं, वे कहते हैं- ‘‘लड़की जात की बहुत बेकद्री हुई है। इन्हें हमेशा दबाकर रखा, पढऩे नहीं दिया। अब इन लोगों को मौका मिलना चाहिए।’’ मौका मिलने पर लड़की क्या कर सकती है, ये वंदना ने करके दिखा ही दिया है। 
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शाबाश वंदना तुम पर हमें गर्व है
बहुत-बहुत बधाई !


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"रामायण" : एक काल्पनिक कथा


"रामायण" एक काल्पनिक कथा है जो कि वास्तविक स्थानों श्रीलंका, अयोध्या, पर आधारित है, जैसे अरब मे विख्यात 'अलिफ़ लैला', 'हातिम ताई' नामक कथायें काल्पनिक हैं, परंतु उसमे दर्शाये गये स्थान 'आबे फारस जबले मक्नातीस', 'दरिया-ए-नील तूर सीना' नामक स्थान वास्तविक हैं।
नासा--पुरातत्व विभाग द्वारा कई वर्षो के संयुक्त शोध के बाद 2007 मे ये सिद्ध हुआ कि रामसेतू लगभग 18 लाख वर्ष पूर्व अस्तित्व मे आया, जो समुद्र तल तक गड़ा हुआ है। जबकि मानव जाति को जन्मे हुए अभी एक लाख वर्ष भी नही हुए। करोड़ो वर्षो पूर्व के डायनासौर के अवशेष भी मिल गये मगर वानर सेना का कोई अता-पता नही चला। 
इस प्रकार का सेतू जापान-कोरिया के बीच मे भी है, और यदि आप विश्व का नक्शा देखें तो उसमे 'नार्थ अमेरिका-साउथ अमेरिका' को जोड़ता हुआ भी एक सेतू है। ठीक वैसे ही आप नक्शे मे 'इंडिया-श्रीलंका' के बीच भी देख सकते हैं। नासा के रिसर्च अनुसार रामसेतु जब 17.5 लाख वर्ष पुराना है, तो इसे राम निर्मित कैसे कहा जा सकता है ? 
जबकि मानव ने खेती करना, कपडे पहनना 8000 हजार वर्ष ईसा पूर्व सीखा है। मानव ने लोहा की खोज 1500 ईसा पूर्व की है, मानव ने लिखना 1300 ईसा पूर्व सीखा है, फिर "राम" नाम लिखकर दुनिया के पहले पशु सीविल इंजीनियर भालू नल-नील ने इसे कैसे बना डाला ? 
मान्यता के अनुसार महाभारत नामक काल्पनिक युद्ध आज से लगभग 6000 वर्ष पूर्व हुआ जबकि श्री वेदव्यास जी ने महाभारत गीता आज से 2300 वर्ष पूर्व लिखा। क्या घटना के 3700 वर्ष पश्चात उसका वर्णन स्वीकार्य है ?? 
यदि उस युग मे कोई 'शक्तिमान', 'स्पाइडरमैन', 'सुपरमैन' भी लिख देता तो आज वो धार्मिक सत्य कथा मानी जाती और उनके जन्म स्थान पर मंदिर बनाने का अहवान होता और राजनीति होती। 
जब इन रहस्यों से पर्दा उठने लगा है तबसे हमारे देश के कुछ नेता अनाप-शनाप बक रहे हैं, कोई कह रहा है कि हमारे देश मे प्राचीन काल मे ही गणेश की गर्दन काट कर उसमे हाथी का सिर प्रत्यरोपित करके 'कृत्रिम सर्जरी' को अंजाम दिया। कोई फर्जी फ़ोटो वीडियो मे खोखले पत्थर नुमा आकार को "राम" लिख कर बाल्टी मे तैरा कर अफ़वाह फैला रहा है कि रामसेतू का पत्थर तैरता है, मगर जब कुछ शातिर लोगों ने स्वयं जा कर देखा तो ऐसा कुछ था ही नही। 
तो कोई कह रहा है के भारत मे देवी देवता लोगो ने प्राचीन युग मे ही एटम बम विकसित कर लिया था. . . तो कोई कह रहा है कि हमारे देश मे प्राचीन काल मे ही हवाई जहाज़, मिसा़ईल राकेट, विकसित कर लिये थे . . .क्योंकि ये राजनीतिज्ञ जानते हैं कि यदि इस काल्पनिक कथाओं की पोल खुल गई तो जनता को मूर्ख बनाना बंद हो जायेगा और इनका धंधा-कुर्सी-राजनीति सब बंद। 
इन लिंक्स पर क्लिक करें और नासा की आफिसियल रिपोर्ट पढे :- 
. . . . . . 
कृपया काल्पनिक पात्रों और कथाओ के नाम पर इस वास्तविक देश को टूटने से बचायें। जब भी दंगे होते हैं ग़रीब बेकसूर मारे जाते हैं, उन्हीं के घर जलते हैं, राजनेताओं के नहीं।  


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सोमवार, जून 13, 2016

सत्यनारायण भगवान और मैं :-)


एक बार सत्यनारायण कथा की आरती का थाल मेरे सामने आने पर मैंने छाँट कर जेब में से कटा-फटा पाँच रुपये का नोट निकाला और कोई देखे नहीं, इस तरह आरती-थाल में डाला दिया। 
वहाँ अत्यधिक ठसाठस भीड़ थी। 
मेरे कंधे पर ठीक पीछे वाले सज्जन ने थपकी मार कर मेरी ओर 500 रुपये का नोट बढ़ाया। मैंने उनसे नोट ले कर आरती में डाल दिया। 
मुझे अपने मात्र 5 रुपये डालने पर थोड़ी लज्जा भी आई। 
बाहर निकलते समय मैंने उन सज्जन को श्रद्धा पूर्वक नमस्कार किया तब वो बोले - 

"बेटा .. जब तुम अपनी जेब से 5 रू का नोट निकाल रहे थे तो तुम्हारी जेब से 500 रु का नोट गिर गया था, जो कि उन्होंने मुझे वापस दिया था।" 
बोलो सत्यनारायण भगवान की जय ! 
.
:-) :-) :-)


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सभ्य समाज में कहाँ है कोई दलित ?


एक आम आदमी सुबह जागने के बाद दाँत ब्रश करता है, नहाता है, कपड़े पहनकर तैयार होता है, अखबार पढता है, नाश्ता करता है, घर से काम के लिए निकल जाता है.....बाहर निकलकर रिक्शा करता है, फिर लोकल बस या ट्रेन पकड़कर ऑफिस पहुँचता है, वहाँ पूरा दिन काम करता है, साथियों के साथ चाय पीता है, शाम को वापिस घर के लिए निकलता है.घर के रास्ते में एक सिगरेट फूँकता है, बच्चों के लिए टॉफी, बीवी के लिए गजरा लेता है, मोबाइल में रिचार्ज करवाता है, और अनेक छोटे मोटे काम निपटाते हुए घर पहुँचता है.... 
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अब आप बताइये कि उसे दिन भर में कहीं कोई दलित मिला ??  क्या उसने दिन भर में किसी दलित पर कोई अत्याचार किया ?? 
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उसको जो दिन भर में मिले, वो थे अख़बार वाले भैया, दूध वाले भैया, रिक्शा वाले भैया, बस कंडक्टर, ऑफिस के मित्र, आंगतुक, पान वाले भैया, चाय वाले भैया, टॉफी की दुकान वाले भैया, मिठाई की दूकान वाले भैया ..... जब ये सब लोग भैया और मित्र हैं तो इनमें दलित कहाँ है ? 
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क्या दिन भर में उसने किसी से पूछा कि भाई, तू दलित है या सवर्ण ? अगर तू दलित है तो मैं तेरी बस में सफ़र नहीं करूँगा, तुझसे सिगरेट नहीं खरीदूंगा, तेरे हाथ की चाय नहीं पियूँगा, तेरी दुकान से टॉफी नहीं खरीदूंगा ...... क्या उसने साबुन, दूध, आटा, नमक, कपड़े, जूते, अखबार, टॉफी, गजरा खरीदते समय किसी से ये सवाल किया था कि ये सब बनाने और उगाने वाले दलित हैं या सवर्ण ? 
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आम तौर पर हम सबके साथ ऐसा ही है, शायद ही कोई आजकल के युग में किसी की जाति पूछकर तय करता है कि फलां आदमी से कैसा व्यवहार करना है. 
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हम सबकी फ्रेंडलिस्ट में न जाने कितने दलित होंगे....क्या आज तक किसी ने कभी भी उनकी पोस्ट लाइक करने से पहले, या उसपर कमेन्ट करने से पहले उनकी जाति पूछी ? क्या किसी से कभी कहा कि तुम दलित हो इसलिए मेरी पोस्ट पर कमेन्ट मत करो ? 
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जब रोजमर्रा की जिंदगी में हमसे मिलने वाले दलित नहीं होते, तो उनमें से कोई मरते ही दलित कैसे हो जाता है ?? 
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जाति धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों को नकार दीजिये.......ये हमें असंगठित कर के हम पर राज करना चाहते हैं......सभी जाति, धर्म के , हम भारतीय मिलकर इन्हें खदेड़ दें. 
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संगठित हो जाइये.....हम सब भारतीय हैं.

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भारत का पक्का बदमाश : "महात्मा गांधी"


1939 अक्टूबर माह की एक दोपहर 12 बजे एक छोटे से स्टेशन पर रेल गाड़ियों की क्रासिंग हो रही थी। एक बंगाली युवक गांधी से भेंट करने सेवाग्राम जा रहा था। तभी उसे गाड़ी में पता चला कि गांधी तो क्रासिंग के लिए बाजु खड़ी ट्रेन से दिल्ली जा रहे हैं। 
...... 
वह फटाफट उतरा और पास खड़ी में गांधीजी के डिब्बे से बिलकुल सटे हुए डिब्बे में चढ़ गया । चढ़ते ही उसने अपने झोले से एक पुस्तक निकाली उसका शीर्षक था - "भारत का पक्का बदमाश : महात्मा गांधी " 
.... 
पुस्तक का शीर्षक देखते ही सहयात्री एकदम उछल पड़ा और उस बंगाली युवक से पूछ बैठा - अरे भाई ये कैसा टाइटल है बुक का, और तुमने ट्रेन क्यों बदली ? 
... 
युवक ने बताया मेरे मालिक और गुरु गोविन्ददास कौन्सुल ने ये किताब लिखी है और इस की सम्मति लिखवाने के लिए मैं गांधीजी के पास सेवाग्राम जा रहा था। पर इस जगह मालूम हुआ कि गांधीजी तो बगल में खड़ी रेल से अपनी मण्डली के साथ दिल्ली जा रहे है सो मैं यही उतर गया और इस ट्रेन में सवार हो गया और अब मैं पास वाले डिब्बे में जाकर गांधीजी से इस पुस्तक पर सम्मति के दो शब्द लिखवाऊंगा। 
भौचक हुआ सहयात्री बोल पड़ा - अरे भाई पुस्तक का नाम तो थोडा ठीक-ठाक रखा होता और मुझे तो नही लगता की गांधीजी इस पर सम्मति भी लिख देंगे। वह बंगाली युवक बोला मैं जा रहा हूँ गांधीजी के डिब्बे में क्या तुम साथ आओगे। सहयात्री की तो हिम्मत नही हुई । 
सो वह बंगाली युवक अकेला ही गांधीजी के डिब्बे में घुस गया। और थोड़ी ही देर में गांधीजी से सम्मति लिखवाकर वापस अपनी जगह आ गया। तब उसने अपने सहयात्री के पूछने पर बताया। 
गांधीजी के डिब्बे में मेरे हाथ में "भारत का पक्का बदमाश : महात्मा गांधी" ये पुस्तक देखते ही गांधीजी का साथी गुस्से से लाल-पीला हो उठा और मेरे हाथ से पुस्तक छीनकर एक कोने में फेंकने ही वाला था की गांधीजी का ध्यान इस तरफ गया और वे बोले - "लाओ तो सही इधर देखूं क्या हैं" 
"बापू आप क्यों अपना वक्त बर्बाद करते हैं फिजूल की गाली-गलौज होगी इसमें" .. बापू के साथ चल रहे..लोग बोले। 
गांधी बोले - भले ही गाली हो इसमें। गालियों से हमारा क्या बिगड़ता है ? और पुस्तक गांधीजी ने मेरे हाथ से लेकर पूछा - "क्या चाहते हो तुम "? 
... 
मैंने तुरन्त कहा की इस पुस्तक पर आपकी सम्मति चाहिए। तब गांधीजी ने पुस्तक के पन्ने उलट पुलट कर थोड़ी देर देखा और हंसकर बोले - "अरे तुम्हारे गुरु तुम्हारे मालिक ने तो सब कुछ लिख दिया है, अब मैं क्या और लिखू " ? 
... 
मैंने कहा बापू आप जो चाहे पर सम्मति के रूप में कुछ तो लिख दीजिये। तब बापू ने कहा अच्छी बात है लिख देता हूँ। 
गांधी जी ने उस पुस्तक पर ये लिखा था - 
"प्रिय मित्र; 
मैंने अभी पांच मिनिट तक आपकी पुस्तक सरसरी तौर पर देखी । इसके मुखपृष्ठ या मज़मून के विरोध में मुझे कुछ भी नही कहना हैं। आपको पूरा अधिकार हैं कि जो पद्धति आपको अच्छी लगे उसके द्वारा आप अपने विचार प्रकट करें। 
भवदीय : मो.क.गांधी 
रेल में : 1-10-39 " 
मित्रों ! 
कहाँ इतनी सहिष्णुता और कहाँ आज का दौर जहां खान पान को लेकर लोग एक दूजे की जान पत्थरो से मार-मार कर ले लेते हैं। 
बापू तुम फिर आना मेरे देश ! 

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रविवार, जून 12, 2016

शक्ति का बिखराव


एक बार कबूतरों का झुण्ड, बहेलिया के बनाये जाल में फंस गया। सारे कबूतरों ने मिलकर फैसला किया और जाल सहित उड़ गये "एकता की शक्ति" की ये कहानी आपने यहाँ तक पढ़ी है .... इसके आगे क्या हुआ वो आज प्रस्तुत है : - 

बहेलिया उड़ रहे जाल के पीछे पीछे भाग रहा था। एक सज्जन मिले और पूछा क्यों बहेलिये तुझे पता नही कि "एकता में शक्ति "होती है तो फिर क्यों अब पीछा कर रहा है ? 
बहेलिया बोला "आप को शायद पता नही कि शक्तियों का अहंकार खतरनाक होता है जहां जितनी ज्यादा शक्तियां होती है, उनके बिखरने के अवसर भी उतने ही ज्यादा होते है"। 
सज्जन कुछ समझे नही ! बहेलिया बोला आप भी मेरे साथ आइये। सज्जन भी उसके साथ हो लिए। 
उड़ते उड़ते कबूतरों ने उतरने के बारे में सोचा ... एक नौजवान कबूतर जिसकी कोई राजनीतिक विचारधारा नहीं थी, उसने कहा किसी खेत में उतरा जाये ... वहां इस जाल को कटवाएँगे और दाने भी खायेंगे। 
एक समाजवादी टाइप के कबूतर ने तुरंत विरोध किया कि गरीब किसानो का हक़ हमने बहुत मारा...अब और नही !! 
एक दलित कबूतर ने कहा, जहाँ भी उतरे पहले मुझे दाना देना और जाल से पहले मैं निकलूंगा क्योकि इस जाल को उड़ाने में सबसे ज्यादा मेहनत मैंने की थी। 
दल के सबसे बुजुर्ग कबूतर ने कहा, मै सबसे बड़ा हूँ और इस जाल को उड़ाने का प्लान और नेतृत्व मेरा था,, अत: मेरी बात सबको माननी पड़ेगी। 
एक तिलक वाले कबूतर ने कहा किसी मंदिर पर उतरा जाए, बंसी वाले भगवन की कृपा से खाने को भी मिलेगा और जाल भी कट जायेंगे। - तुरंत ही टोपी वाले कबूतर ने विरोध किया, उतरेंगे तो सिर्फ किसी मस्जिद पर ही। 
अंत में सभी कबूतर एक दुसरे को धमकी देने लगे कि मैंने उड़ना बंद किया तो कोई नहीं उड़ नही पायेगा, क्योकि सिर्फ मेरे दम पर ही ये जाल उड़ रहा है और सभी ने धीरे-धीरे करके उड़ना बंद कर दिया। 
परिणाम क्या हुआ कि अंत में वो सभी धरती पर आ गये और बहेलिया ने आकर उनको जाल सहित पकड़ लिया। 
सज्जन गहरी सोच में पड़ गए .... बहेलिया बोला क्या सोच रहे है महाराज !! सज्जन बोले "मै ये सोच रहा हूँ कि ऐसी ही गलती तो हम सब भी इस समाज में रहते हुए कर रहे है। 
बहेलिया ने पूछा - कैसे ? 
सज्जन बोले - हर व्यक्ति शुरू में समाज में अच्छा बदलाव लाने की चाह रखते हुए काम शुरू करता है, पर जब उसे ऐसा लगने लगता है कि उससे ही ये समाज चल रहा है, तो वो चाहता है सभी उसके हिसाब से चलें। तब समस्या की शुरुआत होती है। जैसा इन कबूतरों के दल के साथ हुआ, क्योकि जाल उड़ाने के लिए हर कबूतर के प्रयास जरूरी थे और सिर्फ किसी एक कबूतर से जाल नही उड़ सकता था। 
इसलिए यदि अन्य लोग भी ऐसी नकारात्मक सोच रखेंगे और अपने प्रयास बंद कर देंगे तो समाज में भी गिरावट आएगी। हमें अपने हिस्से के प्रयास को कभी भी बंद नहीं करना चाहिए ! 

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जहाँ बकरियां पेड़ों पर दिखती हैं

ये फोटोशॉप का कमाल नहीं है जी ! 

उत्तरी अफ्रीका का मोरक्को एक ऐसा देश है, जहां बकरियां पेड़ों पर चढ़ जाती हैं। ऐसे दृश्य मोरक्को में अक्सर दिखाई पड़ते हैं, वहां दर्जनों की संख्या में बकरियां पेड़ों पर मौजूद मिलती है। ये कौवों की तरह पेड़ की चोटी पर भी बैठी दिखती है। 


कहते हैं कि तेज ढलानों वाले इलाकों और पहाड़ों पर आते-जाते बकरियां पेड़ों पर चढ़ने के काबिल बनती हैं। बकरियों को खाने की तलाश में पहाड़ों पर जाना पड़ता है। क्योंकि मोरक्को के ज्यादातर इलाके काफी सूखे और रेगिस्तान वाले हैं, इसलिए बकरियों को जमीन पर खाना कम ही मिल पाता हैं। पेड़ पर चढ़ने के पीछे भी पेट भरना ही मुख्य वजह है। 


कम उम्र से ही ऐसा करने की वजह से बकरियां धीरे-धीरे स्किल्ड हो जाती है। यहां आर्गन ट्री नाम का फलों का एक पेड़ पाया जाता है जिस पर बकरियां अक्सर जाती है। एक आर्गन ट्री करीब 8 से 10 मीटर ऊंचा होता है।  


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बीवी और गुमशुदा कार



मीटिंग के बाद एक युवती होटल से बाहर आई। उसने अपनी कार की चाभियाँ तलाशीं लेकिन उसे नहीं मिली। वापस मीटिंग रूम में जाकर देखा, वहाँ भी नहीं थीं। 
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अचानक उसे लगा कि, चाभियाँ शायद वो कार के इग्नीशन में ही लगी छोड़ आई थी। उसके पति बहुत बार उसकी इस आदत के लिए डाँट चुके थे। 
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खैर, 
जब युवती पार्किंग में पहुँची तो उसे समझ आया कि उसके पति सही टोकते थे। पार्किंग खाली थी, कार चोरी हो चुकी थी। 
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युवती ने तुरंत पुलिस को कॉल किया, अपनी लोकेशन और पार्किंग एड्रेस बताया और कार चोरी की पूरी जानकारी दी। 
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फिर युवती ने अपने पति को डरते-डरते काल लगाईं और बोली---" डार्लिंग ( ऐंसे समय वो उन्हें डार्लिंग कहकर ही बुलाती थी) मैं अपनी कार की चाबियाँ इग्नीशन में भूल गई और हमारी कार चोरी हो गई।" 

फोन पर थोड़ी देर शान्ति रही। उसे लगा उसके पति गुस्से में फोन काट देंगे। लेकिन फिर पति की गुस्से में चिल्लाने की आवाज आई-- "बेवकूफ, मैं खुद तुम्हे मीटिंग अटेंड करने के लिए होटल छोड़कर आया था !" 

अब शांत रहने की बारी युवती की थी। वो खुश हो गई थी कि, चलो कार चोरी तो नहीं हुई। फिर उसने कहा --- 
"ओके, तो फिर प्लीज, मुझे लेने के लिए आ जाओ।" 
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पति फिर चिल्लाए-- 
"नानसेंस ... मैं तुम्हें लेने के लिए आ जाऊँगा, लेकिन पहले इस पुलिस वाले को तो बताओ कि मैंने तुम्हारी कार नहीं चुराई है, जिसने मुझे पकड़ रखा है...." 
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:-) :-) :-)

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शुक्रवार, जून 10, 2016

अपेक्षाओं का कोई अन्त नहीं



रात के समय एक दुकानदार अपनी दुकान बन्द ही कर रहा था कि एक कुत्ता दुकान में आया । उसके मुॅंह में एक थैली थी। जिसमें सामान की लिस्ट और पैसे थे। दुकानदार ने पैसे लेकर सामान उस थैली में भर दिया। कुत्ते ने थैली मुॅंह मे उठा ली और चला गया। 
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दुकानदार आश्चर्यचकित होके कुत्ते के पीछे पीछे गया, ये देखने कि इतने समझदार कुत्ते का मालिक कौन है।
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कुत्ता बस स्टाॅप पर खडा रहा। थोडी देर बाद एक बस आई जिसमें चढ गया। कंडक्टर के पास आते ही अपनी गर्दन आगे कर दी। उस के गले के बेल्ट में पैसे और उसका पता भी था। कंडक्टर ने पैसे लेकर टिकट कुत्ते के गले के बेल्ट मे रख दिया। अपना स्टाॅप आते ही कुत्ता आगे के दरवाजे पे चला गया और पूॅंछ हिलाकर कंडक्टर को इशारा कर दिया। बस के रुकते ही उतरकर चल दिया। 
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दुकानदार भी पीछे पीछे चल रहा था। कुत्ते ने घर का दरवाजा अपने पैरों से 2-3 बार खटखटाया। अन्दर से उसका मालिक आया और डंडे से उसकी पिटाई कर दी। 
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दुकानदार ने मालिक से इसका कारण पूछा। 
मालिक बोला - "इस साले ने मेरी नींद खराब कर दी। चाबी साथ ले कर नहीं जा सकता था गधा ?" 
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जीवन की भी यही सच्चाई है। 
लोगों की अपेक्षाओं का कोई अन्त नहीं है। 


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हिन्दू और मुसलमान दोनो धरती के बोझ है ?


250 वर्ष का इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि वर्ष 1800 के बाद जो दुनिया मे तरक़्क़ी हुई, उस मे पश्चिम मुल्को यानी सिर्फ यहूदी और ईसाई लोगो का ही हाथ है। हिन्दू और मुस्लिम का इस विकास मे 1% का भी योगदान नही है। 
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1800 से लेकर 1940 तक हिंदू और मुसलमान सिर्फ बादशाहत या गद्दी के लिये लड़ते रहे। दुनिया के 100 बड़े वैज्ञानिको के नाम लिखे तो बस एक या दो नाम हिन्दू और मुसलमान के मिलेंगे। 
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पूरी दुनिया मे 61 इस्लामी मुल्क है, जिनकी जनसंख्या 1.50 अरब के करीब है, और कुल 435 यूनिवर्सिटी है। दूसरी तरफ हिन्दू की जनसंख्या 1.26 अरब के क़रीब है और 385 यूनिवर्सिटी है, जबकि अमेरिका मे 3 हज़ार से अधिक, जापान मे 900 से अधिक यूनिवर्सिटी है। ईसाई दुनिया के 45% नौजवान यूनिवर्सिटी तक पहुंचते है, वही मुसलमान के नौजवान 2% और हिन्दू के नौजवान 8 % तक यूनिवर्सिटी तक पहुंचते है। दुनिया के 200 बड़ी यूनिवर्सिटी मे से 54 अमेरिका, 24 इंग्लेंड, 17 ऑस्ट्रेलिया, 10 चीन, 10 जापान, 10 हॉलॅंड, 9 फ़्राँस, 8 जर्मनी, 2 भारत और 1 इस्लामी मुल्क मे है। 
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अब हम आर्थिक रूप से देखते है। अमेरिका का जी.डी.पी 14.9 ट्रिलियन डॉलर है जबकि पूरे इस्लामिक मुल्क का कुल जी.डी.पी 3.5 ट्रिलियन डॉलर है। वही भारत का 1.87 ट्रिलियन डॉलर है। दुनिया की 38000 मल्टिनॅशनल कंपनी में से 32000 कंपनी सिर्फ अमेरिका और युरोप मे है। 
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अभी तक दुनिया के 10000 बड़ी अविष्कारो मे 6103 अविष्कार अकेले अमेरिका मे और 8410 अविष्कार ईसाई या यहूदी ने किये है। दुनिया के 50 अमीरो मे 20 अमेरिका से, 5 इंग्लेंड से, 3 चीन, 2 मक्सिको, 2 भारत और 1 अरब मुल्क से है। --- अब हम आप को बताते है कि हम हिन्दू और मुसलमान जनहित, परोपकार या समाज सेवा मे भी ईसाई और यहूदी से बहुत पीछे है। रेडक्रॉस दुनिया का सब से बड़ा मानवीय संगठन है। 
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बिल- मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन मे बिल गेट्स ने 10 बिलियन डॉलर से इस फाउंडेशन की बुनियाद रखी है। जो कि पूरे विश्व के 8 करोड़ बच्चो की सेहत का ख्याल रखती है। 
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वहीँ भारत मे कई अरबपति है। मुकेश अंबानी अपना घर बनाने मे 4000 करोड़ खर्च कर सकते है, और अरब का अमीर शहज़ादा अपना स्पेशल जहाज पर 500 मिलियन डॉलर खर्च कर सकता है मगर मानवीय सहायता के लिये आगे नही आ सकता है। 
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अब आप खुद अंदाजा लगाइये के हिन्दू और मुसलमान की इस धरती पे क्या औकात है। बस हर हर महादेव और अल्लाह हो अकबर के नारे लगाने मे हम सबसे आगे हैं।


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गुरुवार, जून 09, 2016

वेटिकन सिटी में धंदा


वेटिकन सिटी में दो भिखारी बैठे थे ... 
एक के हाथ में ॐ था और दुसरे के हाथ में जीसस का क्रॉस ! 
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लोग वहां से निकलते और सब ॐ वाले भिखारी को गुस्से से देख के क्रॉस पकड़े हुए भिखारी को पैसे दे कर जा रहे थे ! 
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थोड़ी देर के बाद वहां से क्रिस्चियन के धर्मगुरु पॉप निकले ,,, उन्होंने ये देखकर ॐ वाले भिखारी को बोला - 

"भाई ये क्रिस्चियन लोगों का देश है .. यहाँ कोई तुम हिन्दू को भीख नहीं देगा ... सच तो ये है कि लोग यहाँ तुम्हे चिढाने के लिए क्रॉस वाले भिखारी को ज्यादा पैसा दे देते हैं .... 
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ॐ वाले भिखारी ने क्रॉस वाले भिखारी को देखा और बोला - 

"जिग्नेस भाई ~~" 

"बोलो मनसुख भाई ~~" 

"अब ये हमें सिखाएगा धंदा करना ?????"
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:-)  :-) :-)  

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पिता-पुत्र कथा



माँ के निधन के पश्चात इकलौते बेटे ने पत्नी के कहने में आ कर अपने पिता को वृद्धाश्रम में भेजने का निर्णय ले लिया। पिता की समस्त भौतिक वस्तुएँ समेट वो एक ईसाई पादरी द्वारा संचालित वृद्धाश्रम में पिता को ले आया। 
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काउंटर पर बैठी क्लर्क ने बहुत से विकल्प दिए टेलीविज़न, एसी, शाकाहारी, मांसाहारी इत्यादि । पिता ने सादे एक वक़्त के शाकाहारी भोजन को छोड़ सब के लिए मना कर दिया। 
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पुत्र पिता का सामान कार से निकालने बाहर गया । तभी पत्नी ने फ़ोन किया ये पता लगाने के लिए कि सब कुछ ठीक से निपटा या नहीं । और इस बात के लिए पति को ज़ोर देकर आगाह किया की उसके पिता को अब त्योहारों पर भी घर आने की ज़रुरत नहीं। 
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क्रिश्चियन पादरी बाहर आये पिता को देख उनकी और बढ़ गये और उनके दोनों कन्धों पर हाथ रख कर बात करने लगे। 
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इस दौरान पिता हिम्मत से मुस्कुराते रहे। 
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बेटे को बड़ा आश्चर्य हुआ, उसने तुरंत निकट पहुंचकर पादरी से पूछा कि क्या वो पूर्व परिचित हैं ? जो इतनी बेतकल्लुफी से बात कर रहे हैं ? 
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पादरी ने गीली आँखें पोछते हुए बेटे को देखा और कहा - हाँ ! बहुत ही अच्छे से। आपके पिता 30 साल पहले यहां आये थे और अपने साथ एक अनाथ बच्चे को ले गए थे, गोद लेने के लिए !!! बेटा अवाक था....!!! 

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