रविवार, अप्रैल 28, 2013

एक नज़रिया ये भी .....

जैसा कि समाचार पत्रों और न्यूज चैनल्स से खुलासा हुआ है कि दिल्ली के दरिंदो ने पहले कालगर्ल खोजी फिर नही मिलने पर गुडिया को रौंद डाला ! ठीक यही निर्भया उर्फ़ दामिनी केस में भी हुआ था ! वो दरिन्दे भी सडक पर बस लेकर कालगर्ल खोज रहे थे ! 

सामाजिक सरंचना से जुडी बलात्कार रूपी बीमारी को दुनिया की कोई भी कानून व्यवस्था ठीक नहीं कर सकती ! जब रोग और रोगी दिखाई दे, तब तो उपचार हो सकता है किन्तु जब रोग और रोगी समाज के रंगीन आवरण से ढका हो तो इलाज सिर्फ और सिर्फ स्वस्थ सामाजिक व्यवस्था से ही संभव है, इसके लिए पुलिस और कानून व्यवस्था को पूर्ण रूप से दोषी ठहराना उचित नहीं है ! कुछ लोगो को मेरी ये बात अटपटी लग सकती है लेकिन यदि भारत सरकार कुछ बड़े शहरों में जहा पर प्रवासी लोग मजदूरी करने ज्यादा आते है यदि वहाँ वेश्यावृत्ति को क़ानूनी रूप देकर उन्हें कुछ शर्तो के साथ यदि स्वीकृति दे दे तो देश में बहुत से बलात्कार रोके जा सकते है ! 

सआदत हसन मंटो की किताब में पढ़ा था कि- 
 "तुम क्यों वेश्याओ को हिराकत की नजर से देखते हो ? वो है तभी तो तुम्हारे घरो की बहू बेटिया सलामत है" 

 वेश्यावृति दुनिया का सबसे पुराना पेशा माना जाता है .. हिन्दूधर्म में इनका कई रूप में महत्वपूर्ण उल्लेख है .. इनके लिए गणिका, नगरवधू, देवदासी आदि शब्द इस्तेमाल किये गये है .. चाणक्य ने भी समाज में इनकी महत्ता बताई है ..और पुराने युग में इन्हें शत्रु राजाओ को मारने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था जिन्हें विषकन्या भी कहते थे ! 

हिन्दी की मशहूर लेखिका शिवानी ने भी लिखा है की ये वेश्याए समाज की गंदगी को खुद के अंदर लेकर समाज को साफ रखती है ! 

एम्सटर्डम में एक समय में बलात्कार के बहुत केस बढ़ गये थे .. इतने ज्यादा कि मीडिया ने एम्सटर्डम को रेप केपिटल ऑफ़ यूरोप घोषित कर दिया था ... लेकिन वहाँ की सरकार ने कुछ समाजशास्त्रीयो के सुझाव पर वेश्यावृति को क़ानूनी रूप देकर उन्हें लाइसेंस दे दिया गया, जिससे कुछ हफ़्तों के अंदर ही बलात्कार में नाटकीय ढंग से गिरावट आई 
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देश की सबसे बड़ी समाचार पत्रिका इंडिया टुडे की इस बार की कवर स्टोरी- यह देश गुड़िया के रहने के काबिल नहीं, क्योंकि आपकी गुड़िया पर जिनकी बुरी नजर है, वे 90% मामलों में आपके रिश्तेदार, पड़ोसी और परिचित हैं.....
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THE END

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'एक नज़रिया ये भी .... ' मुद्दे को 'विचार-विमर्श' हेतु मंच पर प्रकाशित किया गया था !

'विचार-विमर्श मंच के सुधी सदस्यों द्वारा प्राप्त बहुमूल्य प्रतिक्रियाएं :
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कुसुम वीर : 
प्रिय प्रकाश जी, मैं आपके नज़रिए से सहमत नहीं हूँ l मेरे विचार से दुष्कर्म में कमी तभी आ सकती है यदि ;
1. दुष्कर्मी को तत्काल बहुत सख्त सज़ा / फाँसी दी जाए ;
2. सिनेमा / दूरदर्शन से अशलील चित्र हटाए जाएं ;
3.Times of India के Delhi Times में औरतों के नग्न चित्र न दिए जाएं
4. अशलील CD /sim आदि पर रोक लगे ;
5 महिलाएं back less / shoulder less / mini अशलील dresses पहनना छोड़ दें l
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प्रकाश गोविंद : 
मैं स्वयं भी पूर्णतयः तो सहमत नहीं हूँ ... बस यह भी एक नजरिया है ... एक ही विषय के बहुत सारे नजरिये हो सकते हैं !
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विजय निकोर :  
कुसुम जी, मै आपकी सूची से सहमत हूँ, उसमें एक # ६ और जोड़ना चाहता हूँ.... ६. बच्चों को घर में और स्कूल में महिलाओं के प्रति आदर और सदभाव के लिए शिक्षा पर महत्व दिया जाए, क्योंकि यही बच्चे बाद में युवक बनेंगे।  सादर, 
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कुसुम वीर : 
बिलकुल ठीक, विजय जी, बहुत ही सही कहा आपने l मैं जब news papers, magazines,TV, या cinemas में महिलाओं के अर्ध नग्न, अशलील चित्र देखती हूँ, तो मन बहुत व्यथित होता है l Because, this is also one of the reason of rapes in the society.
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डा० दीप्ति गुप्ता : 
आदरणीय कुसुम जी , आपकी बात अपने में पूरी तरह सही है ! देश में प्राचीन काल से यह प्रथा प्रचलित रही है ! नगर-वधू के रूप में प्रचलित इस प्रथा का खुलासा आचार्य चतुरसेन के उपन्यास 'वैशाली की नगर वधू' में हुआ है ! इसके अलावा शूद्रक के 'मृच्छकटिकम' की 'वसंतसेना' भी ! लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू वह भी है, जो प्रकाश जी ने रखा है !

कुछ व्यवहारिक कारणों से वेश्यावृत्ति को क़ानूनी स्वीकृति मिलनी चाहिए ! यह प्रस्ताव विचाराधीन है ! Ministry of Women & Child Development की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 3 लाख सैक्स वर्कर्स है, जिनमे 35% 18 साल की उम्र से इस पेशे में आती है ! 1997 से 2004 के मध्य वेश्यावृत्ति 50% बढ़ी ! महाराष्ट्र और कर्नाटक की 'देवदासी बेल्ट' के बारे में कौन नहीं जनता ! हमारे देश में सिर्फ जम्मू और काश्मीर में वेश्यावृति वैध है ! According to the Public Prostitutes Registration Rules, 1921, a prostitute can carry on her trade legally if she registers herself with the District Magistrate.

कुछ समाजशास्त्रियों का बड़ा सही तर्क है - यह पेशा गैरकानूनी होने पर भी समाज के कोने-कोने में फल-फूल रहा है, इसलिए समाज का जो दरिद्र हिस्सा इससे आपनी आजीविका चलाता है, उसे जीने का हक देने के लिए व बलात्कार की घटनाओं को कम करने के लिए 'गृह-मंत्रालय' इसे कानूनी स्वीकृति दिए जाने के लिए प्रयास रत है !

गंभीरता से गर सोचे तो हम पायेगें कि वेश्यावृत्ति की जड़ है 'गरीबी' ! हमारे अनुसार इस समस्या का निदान है - गरीबी को दूर करना ! इस बात की क्या गारंटी है की इस पेशे को कानूनी स्वीकृति दिए जाने के बाद भी समाज से बलात्कार की समस्या समाप्त हो जायेगी ! हाँ, कम ज़रूर हो सकती है !
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कुसुम वीर : 
आदरणीय दीप्ति जी, मैं आपसे सहमत हूँ कि पुरातन काल में भी कई कुप्रथाएँ थीं, जिनका खुलासा आचार्य चतुरसेन के उपन्यास 'वैशाली की नगर वधू' और शूद्रक के 'मृच्छकटिकम' की 'वसंतसेना" में किया गया ! लेकिन,यहाँ मेरा अपना मत है कि वैश्यावृत्ति को सामाजिक या कानूनी स्वीकृति मिलने से बालिकाओं का अपहरण, या पैसे की खातिर उनकी खरीद-फरोख्त के मामले और अधिक बढ़ेंगे ! सादर,
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डा० दीप्ति गुप्ता : 
प्रिय कुसुम जी, Prostitution को legalize करने के पीछे जो वजह हैं, उसे नहीं भूलना है ! वह है rape और molestation आदि की वारदातों को कम करना और लगभग समाप्त प्राय करना (समाप्त हो न हो परन्तु कम ज़रूर होगीं ) ! आपने जो लिखा है, वह सब तो अब भी हो रहा हैं और उससे ज्यादा rape और molestation की घटनाएँ बड़ी नृशंसता के साथ घट रही है ! तो कम से कम इन दोनों बातों में से, एक पर तो नियंत्रण पाया जा सकेगा ! जिन देशों में यह legalize कर दिया गया हैं वहाँ सरकारी सर्वे के अनुसार sexual abuse में बहुत गिरावट आई है ! 

वैसे तो हमें भी व्यक्तिगत रूप से Prostitution को legalize करना कोई शोभनीय नहीं लगता, लेकिन जब सामाजिक रूप से इस विषय पे छिडी बहस को हर दृष्टिकोण से व्यवहारिक तल पर बार-बार सोचा तो, पसंद-नापसंद, शोभनीय-अशोभनीय को एक तरफ सरकाना ही उचित लगा और सभी विचारकों, समाजशास्त्रियों के सुझाव व्यावहारिक दिखे !   सादर ! 
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कनु : 
वेश्यावृत्ति को वैध करने के सम्बन्ध में सबसे पहले कल प्रकाश जी, फिर कुसुम जी, फिर दीप्ति जी ने अपने -अपने सुचिंतित विचार रखे. मुझे प्रकाश जी और दीप्ति जी की सभी दलीले और उदाहरण तर्क सम्मत लगे. दीप्ति जी ने जो यह तथ्य प्रस्तुत किया , वह अकाट्य है - 
कुछ समाजशास्त्रियों का बड़ा सही तर्क है - यह पेशा गैरकानूनी होने पर भी समाज के कोने-कोने में फल फूल रहा है , इसलिए और समाज का जो दरिद्र हिस्सा इससे आपनी आजीविका चलाता है, उसे जीने का हक देने के लिए व बलात्कार की घटनाओं को कम करने के लिए 'गृह मंत्रालय' इसे कानूनी स्वीकृति दिए जाने के लिए प्रयास रत है ! 

तो सीधी सी बात है कि जब गैरकानूनी होने पर भी वेशायावृत्ति सदियों से समाज अपनी जड़े फैलाए हुए है तो इससे बेहतर है कि उसे वैध बनाया जाए . यह बात आज फिर से दीप्ति जी ने लिखी है फिर संजीव जी ने भी दोहरराई है कि जिन देशों में इसे कानूनी स्वीकृति दी गई हैं , वहाँ बलात्कार की घटनाओं में कमी आई है. 

समाज में अच्छे-बुरे, साधु और वेश्या, सबकी अपनी-अपनी अहमियत है. आम्रपाली का बौद्ध भिक्षु से प्रश्न और ज्ञान के ऐसे संवाद कहना जिनके उत्तर भिक्षु के पास भी नहीं थे, कहने का तात्पर्य ये है कि अगर हम चाहे कि समाज में सब उत्तम ही उत्तम हो तो ऐसा चाहते हुए भी हो नहीं हो सकता.भगवान ने अपने बनाये हाड-मांस के पुतलों में राग-वैराग, ईमानदारी-बेईमानी, भावनात्मक और शारीरिक पवित्रता-अपवित्रता , सब इस तरह भर दी है कि उस पे सभी भावों, शरीर की सभी मांगों का कब्ज़ा क्रमानुसार होता रहता है. इस पापी शरीर के चलते इसकी भूख से पुरुष हमेशा ग्रस्त रहेगा. 

गलती तो भगवान की है जिसने इंसान को शरीर की अतिरिक्त भूख के साथ धरती पर उतारा. इसलिए इस भूख को भी आदमी मिटाएगा ही. इसकी सहजता के मद्देनज़र वेश्यावृत्ति वैध हो जाए तो वाकई पुरुष की भूख मनोज्ञानिक स्तर पे खुद ही कम हो जायेगी, जब किसी चीज़ पे पाबंदी होती है, तब उसकी ओर आदमी अधिक लपकता है. और जब पाबंदी हटा ली जाती है तो वह अनिच्छुक रहने लगता है . सादर, 
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संजीव वर्मा 'सलिल' : 
कनु जी हम किसी व्यवसाय का औचित्य स्वीकार करें और उसे हेय या पाप भी कहें यह कितना उचित है? पुण्य या पाप का वर्गीकरण क्यों आवश्यक है? नारी को पूज्या कह-कह कर हमने भोग्या ही नहीं शोषिता भी बना दिया. देह व्यवसाय को पुण्य या पाप क्यों कहें? यह जब तक सामान्य व्यवसाय नहीं माना जायेगा तब तक इसमें संलग्न व्यवसायी स्त्री-पुरुष और उनके स्वजन लज्जित अनुभव करेंगे। मैं नहीं समझ पाता कि मन की पवित्रता की तुलना में तन की पवित्रता अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों हो जाती है?
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प्रकाश गोविन्द :   
आदरणीय संजीव 'सलिल जी की यह बात अत्यंत महत्वपूर्ण एवं विचारणीय है कि "मन की पवित्रता की तुलना में तन की पवित्रता अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों हो जाती है? इसी मान्यता के चलते इस देश में स्त्री जाति का सबसे ज्यादा शोषण होता आया है !

मुझे तो आये दिन समाचार पत्र और न्यूज चैनल पर बोले जाने वाले शब्द "इज्जत लुटी" पर ही आपत्ति है ... एक स्त्री का सम्पूर्ण अस्तित्व महज यौन शुचिता से जोड़कर देखा जाना किसी द्रष्टि से सही नहीं माना जा सकता !
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कुसुम वीर : 
आदरणीय प्रकाश जी, आपने तो बिलकुल मेरे मन की बात कह दी !
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महेश चन्द्र द्विवेदी : 
प्रकाश जी - आप के खुले चिंतन एवं स्पष्टोक्ति के लिए हार्दिक बधाई. बलात्कार का कारण लिखित एवं चित्रित कला/साहित्य में खुला कामोद्देपन तो है ही, साथ ही विपरीत्लिंगी के विषय में अज्ञानता तथा लड़कियों की संख्या घटने, कामेच्छा के प्रति सामाजिक दुराव-छिपाव एवं नगरीकरण के कारण उनकी अनुपलब्धता भी हैं. यदि इन मूल कारनों का निवारण नहीं होता है, तो कानून की कठोरता बहुत सफल नहीं होगॆ. हां, सामाजिक विरोध अवश्य कुछ प्रभावी हो सकता है.
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संजीव वर्मा 'सलिल' : 
मानव समाज में चिरकाल से यह विषय चर्चित रहा है. बलात्संग के इंद्र-अहल्या प्रकरण से सभी परिचित हैं। प्रयास तो जयंत ने भी किया था किन्तु अकस्मात् राम के आ जाने से सीता बच गयीं। नागर सभ्यता में देह व्यवसाय को चाहे अनचाहे मिलता रहा। महल, रजवाड़े, मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरूद्वारे, मठ, आश्रम सर्वत्र देह की चाह और चाहपूर्ति की राह का प्यासा इतिहास का हिस्सा है। कोई भी शासन व्यवस्था और प्रणाली दरिद्रतम को पालने में समर्थ नहीं हो सकी। यदि मुफ्त पालन हो तो कोई भी श्रम न करेगा। ऐसी स्थिति में जो और कुछ न कर सके वह देह का प्रयोग कर पेट भरे तो रोकना कितना उचित है? 

अन्य पक्ष यह भी की जिनके संगी बिछुड़ गए किन्तु वे संयमी या त्तृप्त नहीं हैं वे क्या करें? किसी कारण से जिनके विवाह न हो सकें वे कहाँ जाएँ? जिन्हें रोजी-रोटी की तलाश में परिवार छोड़कर बहुधा लम्बे समय तक बाहर रहना होता है (सेना के जवान, वाहन चालक, श्रमिक आदि), वे अपनी तुष्टि कैसे करें? 
नैतिक मूल्य सबके एक समान नहीं हो सकते। ऐसी स्थिति में मुफ्त या जबरदस्ती संबंधों के लिए विवश की जाती नारी को बचाने का एक प्रयास देह व्यवसाय को कानूनी वैधता देना हो सकता है। कुछ देशों में यह वैध है भी। वहां बलात्संग के प्रकरण कम हैं तथा व्यवसाय में रत स्त्री-पुरुषों को हेय भी नहीं माना जाता। अतः इस विषय में पुनर्विचार किया जाना चहिए.   
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शिशिर : 
आदरणीय कुसुम दीदी,  'पुरातन काल में कुप्रथाएं थी', कुसुम दी, दीप्ति जी ने यह लिखा था कि जो वेश्यावृत्ति की कुप्रथा आज हैं, वह आज की प्रथा नहीं है अपितु अगर हम पीछे मुड के देखें तो, 'नगरवधू और देवदासियों के रूप में प्राचीन कल से चली आ रही है. यानी हर युग, देश,कल, वातावरण में देह की अँगनाए समाज का 'अभीप्सित' अंग रही है. . जन इतने सालों से हम समाज, साहित्य, गायन-वादन में इनके दर्शन कर ही रहे हैं तो इनके साथ अब्नार्मल छुपे-दबे संपर्क रखने के स्थान पर नार्मल और सहज ढंग से संपर्क रखा जाए. अभी कनु जी ने बड़ा मनोवैज्ञानिक आधार दिया है कि जब वेश्याओं से संपर्क साधना वैध हो जाएगा तो काफी प्रतिशत आदमी स्वयं ही अनिच्छुक हुए सही राह पे आ जायेगें. सो यह मामला शारीरिक से ज्यादा भावना और संवेदना के तल पर विरक्ति (सैक्स के प्रति) जगाने का है, जो कामयाब रहेगा.

जब काम-क्षुधा नार्मल रहेगी तो इन पेशेवालियों के प्रति लोगों की आसक्ति मंदी पड़ेगी, आसक्ति मंदी पड़ेगी तो लडकियों के अपहरण, बेचना, खरीद-फरोख्त आदि भी मंदे पड़ जायेगे. सादर,
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प्रकाश गोविन्द : 
मैं एक और भी महत्वपूर्ण बात कहना चाहता हूँ जिसे अनदेखा किया जाता रहा है ... सरकार द्वारा भी और समाज द्वारा भी ! आप लोगों को क्या लगता है - बलात्कार की जो घटनाएं रजिस्टर्ड होती हैं .... जो सामने आ पाती हैं उनका परसेंटेज क्या होता होगा ! वास्तविकता यह है कि हजार-पांच सौ में कोई एक घटना सामने आ पाती है .... ऐसे मामलों में कोई भी अपने घर-परिवार का सम्मान नहीं खोना चाहता .... सब के सब ऐसी घटनाओं को दबाना-छुपाना चाहते हैं ! देश भर में बलात्कार के जो रजिस्टर्ड आंकड़े हैं वो ही बेहद भयावह हैं ..... असली आंकड़ों की बात सोचिये जरा ! 

आज जिस तरह का वातावरण टीवी से, फिल्मों से, विज्ञापन से, ब्ल्यू फिल्मों की सीडी से, अश्लील साईटों से बन रहा है .... उसके आधार पर मैं आज सबसे ज्यादा चिंतित हूँ उन बलात्कारों से जो आम जन-मानस के मनो-मस्तिष्क में चल रहे हैं।  
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