मंगलवार, सितंबर 30, 2008

क्यूँ बदल रहा है बचपन ?


यूँ तो बड़ों जैसा दिखना और बनना हमेशा ही बच्चों की फितरत होती है लेकिन आजकल यह प्रवृत्ति काफ़ी बढ़ गई है और ग़लत रूप में विकसित हो रही है यही वजह है कि वे कम उम्र में ही बड़ों कि तरह व्यवहार करने लगते हैं उनकी मासूमियत और बचपन कहीं गुम - सा नजर आता है !

सके लिए सबसे ज्यादा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जिम्मेदार है तरह तरह कि फंतासी कहानियाँ बच्चों के कोमल मन पर गहरा और बुरा असर दाल रही हैं इनसे बच्चों में अपराध की प्रवृत्ति बढ़ गई और वे अक्सर हिंसक घटनाओं को अंजाम देते हुए नजर आते हैं !

तो पश्चिमी देशों के स्कूलों की तरह भारतीय स्कूलों से भी हैरतअंगेज खबरें सामने आने लगी हैं ! अक्सर सुनाई देता है की फलां स्कूल में एक छात्र ने गोली मारकर किसी सहपाठी की जान ले ली ! इसके लिए अभिभावक भी कम जिम्मेदार नही हैं जो अपने बच्चों पर समय के अभाव में ध्यान नही दे पाते !

अपने बच्चों को कैसा भविष्य देना चाहते हैं यह सोचने की जिम्मेदारी मीडिया और अभिभावक दोनों पर है ! संकीर्ण लाभ के लिए बच्चों की मासूमियत से सौदा ना करें !

बुधवार, सितंबर 17, 2008

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    सोमवार, सितंबर 15, 2008

    आतंकवाद का महिमा मंडन कब तक ?

    तंक का नंगा नाच जारी है कब कहाँ बम फट जाए कुछ नही कहा जा सकता आतंकवादी पूरे देश में खून की होली खेल रहे हैं जैसे ही कहीं बम फटता है मीडिया का पूरा लाव लश्कर वहां पहुँच जाता है उसके बाद टीवी के दर्जनों न्यूज़ चैनल दिन भर ज्यादा से ज्यादा कवरेज दिखाने की होड़ में लगे रहते हैं

    यह सही है कि देश के हर शहर में हर जगह 'सिक्योरिटी' नही रखी जा सकती। मानवता के दुश्मन दहशत फैलाने का रास्ता खोज ही लेंगे, लेकिन हमे अब आतंकवाद के मनोविज्ञान को समझना होगा। किसी भी बम विस्फोट में जब मासूम लोग मरते हैं, तो उन मरने वाले लोगों से आतंकवादियों की किसी तरह की व्यक्तिगत रंजिश नही होती है उनका सिर्फ़ एक ही मकसद होता है - दहशत फैला कर ज्यादा से ज्यादा 'पब्लिसिटी' हासिल करना यहाँ तक कि बम फटने के कुछ ही घंटे के अन्दर स्वयं ही ई- मेल करके अपनी पीठ ठोक लेते हैं।

    किसी भी तरह की आतंकवादी घटना होने पर प्रशासन अपना दायित्व और व्यवस्था चाक चौबंद रखे लेकिन मीडिया को अपना काम गभीरता से समझना होगा। आतंकवाद को 'ग्लेमराइस' करने की जरूरत नही है, अगर न्यूज़ पेपर और न्यूज़ चैनल अपने ऊपर संयम रखें तो आतंकवादियों मनोबल टूटेगा और उन्हें हताशा होगी।


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    रविवार, सितंबर 14, 2008

    गेट वेल सून ..... राज मामू




    अभी जब चीन में ओलम्पिक हो रहा था तो भारत से काफ़ी लोग गए थे , जिसमे अनेक मीडिया कर्मी भी शामिल थे वहां भारतीय भोजन की काफ़ी दिक्कत थी, कुछ होशियार लोगों ने इन्टरनेट की मदद ली और वहां भी ऐसे दर्जनों रेस्ट्रोरेन्ट खोज निकाले जहाँ भारतीय भोजन मिलता था बड़े बड़े साईन बोर्ड में हिन्दी में इंडियन फ़ूड लिखा हुआ था अब जरा सोचिये जरा राज ठाकरे अगर चीन के निवासी होते तो उनको कितना अपमान महसूस हुआ होता ?

    असल में कुछ लोगों का काम ही होता है हर बात में अपना अपमान खोजना मैग्नीफाइंग ग्लास लेकर बैठे रहते हैं कब उनको अपना अपमान दिखाई दे जाए ये तो अच्छा हुआ की तुलसीदास, कबीरदास, मीरा, प्रेमचंद, टैगोर,रजा राम मोहन राय, गाँधी वगैरह राज के शासन काल में नही हुए वरना राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना ने हल्ला बोल दिया होता !

    मित्रों बात मजाक की नही है आज हमें सोचना होगा की इस मल्टीकलर देश में ऐसी कौन सी परिस्थितियां जवाबदेह हैं की अब्दुल बुखारी , सुभाष घीसिंग , भिंडडारवाला, राज ठाकरे जैसे खतरनाक अलगाव वादी वाइरस पनपते रहते हैं ? चाहे लादेन हो या राज ठाकरे ..... ऐसे लोग सिर्फ़ एक व्यक्ति नही होते ये लोग स्वयं में फैक्ट्री की तरह होते हैं जहाँ बहुतायत में अपनी जैसी दूषित विचारधारा वाले लोगों का उत्पादन करते रहते हैं इसलिए ऐसे घातक वाइरस पर जैसे भी हो तत्काल रोक लगानी आवश्यक है !


    शुक्रवार, सितंबर 12, 2008

    हाय मीडिया


    यह कितने शर्म की बात है भारत में टी वी के चैनल्स पर जिन फूहड़ और ऊलजलूल चीजों को समाचार के नाम पर परोसा जा रहा है उनका विरोध उतना नही हो रहा है जितना होना चाहिए. जब हम दूसरे देशों के चैनल्स को देखते है तो पता चलता है कि टी वी पत्रकारिता किस चिडिया का नाम है. देश या विदेश में कितनी बड़ी घटना हो जाए मगर हमारे चैनल को तो नागिन की कहानी / भुतहा हवेली का सच / मोहल्ले के प्रेम प्रसंगों से घटित अपराधों / फ़िल्म जगत की प्रेम कहानियों / बाबाओं के चमत्कारों / रत्न, ताबीज़ बेचने / भविष्य बताने वाले जोकर नुमा ज्योतिषों जैसे कार्यकर्मों से ही फुर्सत नही है

    ये सोचने कि बात है कि क्या आज मीडिया का काम वैज्ञानिक चेतना और शिक्षा के प्रचार -प्रसार की जगह केवल भय और अंधविश्वास का बढ़ावा देना हो गया है। पत्रकारिता व्यापार नहीं मिशन है यह बात जानने और समझने वाले हम आप जलालत महसूस कर सकते हैं और कर रहे हैं लेकिन अफ़सोस.......... क्या उन पर फर्क पड़ेगा ? शायद कभी नही दोस्तों आज जल्दी में हूँ .... आज बस इतना ही .... आगे इस पर चर्चा होगी !