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ये देश है बस अवकाशों का ....

प्रस्तुतकर्ता प्रकाश गोविन्द on Monday, October 6


एक तरफ़ निजी क्षेत्र हैं जहाँ छुटि्टयों के लिए इन्तजार करना पड़ता है और दूसरी तरफ़ सरकारी कार्यालय हैं जो खुलने से ज्यादा बंद रहते हैं [खुलते भी हैं तो कितना काम करते हैं ] विदेशों की नक़ल कर के उन्होंने सप्ताह में दो दिन छुट्टी कर रखी है ...............इसके बाद तुर्रा ये की देशी लाभ 
भी वे ले रहे हैं ! हर छोटे बड़े त्योहार पर छुट्टी उस पर से खोज -खोज कर महापुरुषों की जयंती पर अवकाश घोषित किया जाता है ! 

हर बार वेतन आयोग अपनी रिपोर्ट में छुटि्टयां कम करने की सिफारिश करता है , लेकिन वेतन
तो बढ़ जाता है पर छुटि्टयां हैं की कम होने की बजाए और बढ़ जाती हैं ! इसके बाद सीएल , ईएल और न जाने कितनी छुटि्टयां अलग से ! 

अगर अध्ययन - अध्यापन से जुड़े हैं तब तो कार्य दिवसों से ज्यादा छुटि्टयां के दिन होंगे ! अब जो कार्य दिवस हैं उनमे भी देर से आना , जल्दी जाना , और बीच के डेढ़ घंटे लंच ! जाहिर है कि इन सबके बीच काम का वक्त ही कहाँ बचता है ? इसलिए सरकारी मुलाजिमों को काम करते देखना भी एक दुर्लभ दर्शन ही है ! 

लाजिमी है कि जब काम के लिए वक्त कम है तो फ़िर कौन सा काम होना है , कौन सा नही, इसके लिए  प्राथमिकताएं  निर्धारित करनी होंगी,  अब जिसे अपना काम करवाना हो , वह  फाइल  को प्राथमिकता में लाये और इसके लिए क्या करना पड़ता है , अगर वह नही जानता तो फ़िर फाइलों
के ढेर में उसकी फाइल कैसे शहीद हो जायेगी , यह बेचारी फाइल को भी नही पता चलेगा ! 

ब्रिटिश जमाने में सरकारी काम काज के ये तौर तरीके स्टील फ्रेम की मजबूती के लिए अपनाए गए थे ! आज ये किसे मजबूत कर रहे हैं यह तो तथाकथित जिम्मेदार लोग ही बता सकते हैं !!! 

9 प्रतिक्रियाएं:

appaliwal ने कहा…

dost bilkul sahi kahaa yeh desh kaise chal rahaa hai yeh shaayad sabse badaa aashcharya hai

बेनामी ने कहा…

सही कहा आपने कि सरकारी कर्मचारियों को काम करते देखना भी दुर्लभ दर्शन है

[ संजय अकेला ]
आगरा

बेनामी ने कहा…

भैया ये सरकारी नौकरी पिछले जन्मों का कुछ पुण्य वगैरह का चक्कर है वरना गरीब मेहनतकश लोग तो दो जून की रोटी भी बामुश्किल जुटा पाते हैं ! दूसरी तरफ़ ये सरकारी नौकरी पेशा लोग हैं ,,,,,,, जिनका हाल तो ...अजगर करे न चाकरी , पंछी करे न काम वाला है !

(राम स्नेही पाण्डेय)
वाराणसी

बेनामी ने कहा…

भाई बहुत अच्छा शीर्षक रखा है आपने ..... ये देश है बस अवकाशों का !
बहुत खरी बात कही है आपने !
अच्छा लिखा है आपने ,
मेरी बंधाई स्वीकार करें !

- कामिनी गुप्ता (इलाहाबाद)

बेनामी ने कहा…

सार्थक लेख है आपका !
काश हमने अंग्रेजों से कार्य के प्रति समर्पण का गुण भी सीखा होता !

- एस. एन. भार्गव (चाणक्यपुरी, नई दिल्ली)

basant singh ने कहा…

bahut khoob

jeevan laal ने कहा…

प्रकाश भाई सरकारी नौकरी में इतनी ऐश है तभी तो हर एक का पहला प्रयास सरकारी नौकरी पाना ही रहता है !

runescape gold ने कहा…

I like your blog

intelligence ने कहा…

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