Aaj Ki Aawaaz

मेरे दिल में न सही, तेरे दिल में ही सही !!! हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए !!!

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पहले हम तो सुधरें .......

Posted by प्रकाश गोविन्द on Friday, October 3






          ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल के ताजा आँकड़ों के मुताबिक भारत भ्रष्ट देशों की सूची में ८५ वें पायदान पर है ! पिछले साल के मुकाबले भारत १२ पायदान ऊपर चढ़ा है ! पिछले साल हम चीन के साथ ७२ वें स्थान पर थे ! १८२ देशों में कराये गए सर्वेक्षण में भारत की स्थिति से ख़ुद ब ख़ुद पता चलता है कि हमारे यहाँ भ्रस्टाचार कितनी तेजी से बढ़ रहा है ! आख़िर इसकी वजह क्या है ? अब तो धीरे - धीरे सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों का भी निजीकरण हो रहा है ! इसके बाद भ्रस्टाचार बढ़ने के बजाय घटना चाहिए , लेकिन ऐसा नही हो रहा है ! इसके लिए जितनी जिम्मेदार गठबंधन राजनीति है उतने ही हम भी हैं ! 
            हम औरों को कितना भी कोसें पर इसमे कोई दो राय नही कि भ्रस्टाचार को बढ़ावा देने में हमारा भी हाथ है ! पुलिस में रिपोर्ट लिखवानी हो या फ़िर पासपोर्ट बनवाना हो और या फ़िर ड्राइविंग लाइसेंस बनवाना हो , हम समय बचाने के लिए नियमानुसार काम न करके भ्रस्टाचार को बढ़ावा देते हैं | अपनी बारी का इन्तजार करना हमारी शान के ख़िलाफ़ है ! जब हम सुधरेंगे तभी दूसरों पर उंगली उठा सकते हैं ! 
              सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि प्रशासनिक कामकाज के तौर-तरीके आमजन को ऐसा करने को उकसाते हैं | फ़िर भी व्यवस्था में सुधार के लिए हमे भी धैर्य से काम लेना होगा | बढ़ते भ्रस्टाचार के पीछे भूख, लालच, तुच्छ मानसिकता के अलावा सरकार में दृढ़ इच्छाशक्ति की कमी भी एक अहम् कारण है ! 
              इस दलदल से निकलने के लिए हमें सख्त कदम उठाने होंगे ! ये कदम केवल दिखावे के लिए न होकर देश कि परिस्थितियों को समझते हुए उठाये जाने चाहिए !  

10 प्रतिक्रियाएं:

बेनामी ने कहा…

भ्रस्टाचार का अजगर पूरे देश को लपेटे हुए है | भ्रस्टाचार तो अब जैसे हमारे खून में बह रहा है | बस एक दूसरे को, पड़ोसी को, प्रशासन को, सरकार को कोसते जाओ | दूसरे के घर में भगत सिंह सब चाहते हैं बस अपने घर में तो अम्बानी और सिंघानिया ही चाहिए | बड़ी निराशा होती है आज के हालत देखकर | व्यक्ति निर्माण का सबसे बड़ा केन्द्र स्कूल - कॉलेज होते हैं .... लेकिन वहां तो चरित्र निर्माण या राष्ट्र गौरव जैसी चीजें विकसित होने वाला वातावरण ही नही दीखता |
हर तरफ़ बस आगे बढ़ने की एक दौड़ दिखायी दे रही है ..... अंधी दौड़ | कब और कहाँ ख़तम होगी ये दौड़ने वाले को भी नही मालूम |

- राजेश्वर शुक्ला "राही"
कानपूर

बेनामी ने कहा…

ऐसा लगता है भ्रस्टाचार को सामाजिक मान्यता मिल चुकी है | पहले समाज में अध्यापक, डॉक्टर जैसे लोगों की इज्जत होती थी | आज तो एक से एक अपराधी विधानसभा और संसद में विराजमान हैं | मजे कि बात ये है कि इन्हे चुनती भी जनता ही है | आज तो इज्जतदार वो है जिसके घर में पुलिस और वकीलों का आना जाना हो , दो- चार मुक़दमे चल रहे हों |
आम आदमी तो चूतिया बना ताक रहा है या भीड़ में खड़ा तालियाँ बजा रहा है | आपकी लेखनी के माध्यम से जो आग मैंने महसूस की है वो हम जैसे हजारों के अन्दर भी जल रही है | दुष्यंत कुमार ने कहा है - मेरे दिल में न सही , तेरे दिल में ही सही .... हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए |

लेखन जारी रखें | शुभ कामनाओं के साथ |
- संजय सिंह थापर

बेनामी ने कहा…

भ्रष्टाचार की नदी सदैव ऊपर से बहती है ! जब ऊपर वाले सुधर जायेंगे तो अपने आप सब सही होने लगेगा ! लेकिन अगर यही हाल रहा तो हमें टॉप पर आने में देर नही है !

- संजना श्रेष्ठ
हापुड़

बेनामी ने कहा…

बहुत सही कहा आपने !
आजकल एक ट्रेंड सा बन गया है गरियाने का ! सब लोग ग़लत हैं - सरकार ग़लत, ....शासन ग़लत....पुलिस ग़लत.......नेता ग़लत ....मीडिया ग़लत.... वकील ग़लत....डाक्टर ग़लत...टीचर ग़लत ...... बस हम सही !
अपनी गिरेबान में कोई झांकना ही नही चाहता ! शायद दूसरों को गरियाने से अपने आप का पाप बोध कम होता है ! ख़ुद तो दिन रात ग़लत काम करेंगे दूसरों पर इल्जाम लगाकर पाकसाफ बनेंगे !

- रोहित कुमार विश्वकर्मा
नई दिल्ली

बेनामी ने कहा…

सौ में नब्बे बेईमान ......... फ़िर भी मेरा देश महान

रफीक अंजुम
दिल्ली

shama ने कहा…

Gar hamare samaajme bhrashtachaa hai, to uske zimmedaar ham hain...bhrasht log kahin baharse to nahee aaye...hamareehi maa behno ke jaaye hain...to unpe, iska matlab naa gharme paathshalaon me sahee sanskar hue??Hame apnehi girebaanme jhaan ke dekhna hai ki kya hamare pariwaronme bachhon ko nek aur sachha Bharteey ban neki shiksha mil rahi hai ya nahi ??Gar nahi to phir hame waheen se shuruat karni hai...

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Yogesh ने कहा…

Sach kaha hai aapne. लेकिन कहिये अगर पासपोर्ट ही बनवाना हो बिना पैसे दिये, तो कितना मुश्किल हो जाता है। पुलिस वाले तो मानो आपकी फाइल ही गुम कर देंगें अगर आप पैसे न खिलाओ।


हालांकि, अब चालान पर तो पैसे खिलाने बन्द कर दिये मैंने। कोशिश तो यही रहती है कि चालान हो ही न । हो भी जाये, तो पैसे नहीं देता, चालान भरवा लेता हूँ।

थोड़ा हमारी सरकार को भी process को streamline करने की facility provide करनी चाहिये, जैसे online चालान का भुगतान।

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